विजयराम आजाद
उप सम्पादक मूकनायक
नई दिल्ली।
इतिहास केवल संसदों में नहीं लिखा जाता, कभी-कभी वह फुटपाथों पर बिछी चादरों, बारिश में भीगे तिरंगों, रातभर जलती मोमबत्तियों और अपने भविष्य की चिंता में जागती लाखों आंखों के बीच भी जन्म लेता है। पिछले 36 दिनों तक देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर ऐसी ही एक कहानी का साक्षी बना, जहां हजारों छात्र-छात्राओं ने अपने सपनों, अपने अधिकारों और अपनी आवाज़ को लेकर लोकतांत्रिक विरोध का रास्ता चुना।
सुबह की पहली किरण के साथ जंतर-मंतर पर नारे गूंजने लगते थे। शाम ढलती तो संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ होता। रात गहराती, लेकिन आंदोलन की मशाल बुझती नहीं थी। देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले छात्र अपने साथ केवल बैग और कपड़े ही नहीं लाए थे, वे अपने गांवों, कस्बों और शहरों की उम्मीदें भी साथ लेकर आए थे।
कई छात्र पहली बार दिल्ली पहुंचे थे। किसी ने अपने माता-पिता से उधार लेकर यात्रा की थी, किसी ने दोस्तों से मदद ली थी, तो कई छात्र संगठनों ने मिलकर यात्रा का खर्च उठाया। किसी के पास होटल का कमरा नहीं था, किसी ने धरना स्थल को ही अपना आशियाना बना लिया। खुले आसमान के नीचे रातें बीतती रहीं, लेकिन मंच से उठने वाली आवाज़ें थमती नहीं थीं।
आंदोलन का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और उससे जुड़े छात्र कार्यकर्ताओं के हाथों में दिखाई दिया। संगठन का कहना था कि यह किसी एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं, बल्कि छात्रों और युवाओं की सामूहिक आवाज़ है। मंच पर बार-बार यह संदेश दोहराया जाता रहा कि आंदोलन को किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
दिन बीतते गए और आंदोलन का दायरा बढ़ता गया। विश्वविद्यालयों से शोधार्थी पहुंचे, कॉलेजों से छात्र आए, कई शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। अनेक संगठनों ने समर्थन दिया। सोशल मीडिया पर आंदोलन से जुड़े वीडियो, भाषण और तस्वीरें देशभर में साझा होने लगे। जो छात्र दिल्ली नहीं पहुंच सके, उन्होंने अपने-अपने शहरों में प्रदर्शन और ज्ञापन कार्यक्रम आयोजित किए।
आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर केवल विरोध का स्थल नहीं रहा, बल्कि वह संवाद का मंच भी बन गया। यहां संविधान, शिक्षा, लोकतंत्र, समान अवसर और युवाओं के भविष्य पर लगातार चर्चा होती रही। मंच से बार-बार कहा गया कि छात्रों की आवाज़ को सुना जाना चाहिए और लोकतंत्र में असहमति को स्थान मिलना चाहिए।
सीजेपी के प्रमुख चेहरों में शामिल अभिजीत दीपके लगातार मंच से छात्रों को संबोधित करते रहे। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि आंदोलन किसी व्यक्ति की लोकप्रियता का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिक संघर्ष का प्रतीक है। आंदोलन के अन्य नेताओं—राम जी, दीपक, अभिषेक सिंह और सौरभ दास—ने भी अलग-अलग सभाओं में छात्रों से संयम बनाए रखने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की।
जंतर-मंतर पर हर दिन देश के अलग-अलग हिस्सों की झलक दिखाई देती थी। कहीं महाराष्ट्र के छात्र अपने बैनर के साथ खड़े थे, कहीं बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दक्षिण भारत से आए युवाओं के समूह दिखाई देते थे। भाषाएं अलग थीं, लेकिन मंच पर उठने वाली आवाज़ एक ही थी—”हमारी बात सुनी जाए।”
आंदोलन के दौरान भोजन की व्यवस्था स्वयंसेवकों ने संभाली। कई सामाजिक संगठनों ने पानी, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई। डॉक्टरों की छोटी-छोटी टीमें भी समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करती रहीं। कुछ वकीलों ने कानूनी सहायता देने की घोषणा की। यह दृश्य केवल विरोध का नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग और सामाजिक एकजुटता का भी था।
दिन गुजरते गए, लेकिन मांगों पर निर्णायक समाधान न निकलने से छात्रों में बेचैनी बढ़ती गई। मंच से बार-बार कहा जाने लगा कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार उनकी बात गंभीरता से नहीं सुनती। दूसरी ओर सरकार की ओर से यह कहा गया कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सुधार और संवाद की प्रक्रिया जारी है तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
इसी बीच पूरे देश की निगाहें जंतर-मंतर पर टिक गईं। राष्ट्रीय मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर यह आंदोलन चर्चा का विषय बन गया। समर्थकों ने इसे युवाओं की लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक बताया, जबकि आलोचकों ने इसके विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाए। लेकिन इतना स्पष्ट था कि जंतर-मंतर अब केवल दिल्ली का एक स्थान नहीं रहा था; वह देशभर के युवाओं की उम्मीदों, गुस्से और भविष्य की बहस का प्रतीक बन चुका था।
यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था। अगले कुछ दिनों में घटनाएं ऐसा मोड़ लेने वाली थीं, जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आरोप, टकराव, पुलिस कार्रवाई, राजनीतिक बयान, इस्तीफे और जीत के दावे सब कुछ आने वाले दिनों में इस आंदोलन की कहानी का हिस्सा बनने वाला था।
“25 जुलाई: जब जंतर-मंतर की सड़कें चीखों, नारों और उम्मीदों की गवाह बनीं“
36 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन का 25 जुलाई वह दिन बन गया, जिसकी चर्चा आने वाले वर्षों तक होती रहेगी। सुबह से ही जंतर-मंतर पर असामान्य हलचल थी। देश के अलग-अलग राज्यों से आए छात्र अपने हाथों में तिरंगा, संविधान की प्रतियां और मांगों से जुड़े पोस्टर लिए धरना स्थल पर पहुंच रहे थे। मंच से बार-बार शांति बनाए रखने की अपील की जा रही थी, लेकिन वातावरण में बेचैनी साफ महसूस की जा सकती थी। सभी की निगाहें एक ही प्रश्न पर टिकी थीं—क्या आज सरकार कोई बड़ा फैसला करेगी या संघर्ष और लंबा चलेगा?
धरना स्थल पर मौजूद छात्रों का कहना था कि 36 दिनों से लगातार प्रदर्शन करने के बावजूद उनकी आवाज़ को गंभीरता से नहीं सुना गया। कई छात्र अपने परिवार से दूर थे। किसी की नौकरी छूट गई थी, किसी की परीक्षा प्रभावित हुई थी, तो किसी ने अपनी बचत इस आंदोलन में खर्च कर दी थी। फिर भी उनका कहना था कि यदि भविष्य सुरक्षित करना है, तो आज का संघर्ष आवश्यक है।
दोपहर बढ़ने के साथ भीड़ और बढ़ती गई। मंच से लगातार भाषण हो रहे थे। छात्र नेता संविधान, लोकतंत्र और युवाओं के अधिकारों की बात कर रहे थे। देशभर से आए प्रतिनिधिमंडल अपने-अपने अनुभव साझा कर रहे थे। कई शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त की। पूरे क्षेत्र में एक ओर नारे गूंज रहे थे, तो दूसरी ओर स्वयंसेवक पानी, भोजन और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था में लगे थे।
इसी बीच आंदोलनकारियों के अनुसार प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ने लगा। आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि पुलिस ने भीड़ को हटाने का प्रयास किया और इसके बाद स्थिति तेजी से बिगड़ गई। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि लाठीचार्ज किया गया तथा आंसू गैस के गोले छोड़े गए। उनका कहना है कि इस कार्रवाई से अफरा-तफरी मच गई और कई छात्र अपने साथियों से बिछड़ गए। वहीं प्रशासन की ओर से समय-समय पर यह कहा गया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए।
जो छात्र उस समय वहां मौजूद थे, उनके अनुसार कुछ ही मिनटों में पूरा माहौल बदल गया। जहां कुछ देर पहले संविधान की प्रस्तावना पढ़ी जा रही थी, वहीं अचानक लोग एक-दूसरे को संभालते और सुरक्षित स्थान की ओर ले जाते दिखाई दिए। कई छात्र अपने दोस्तों को फोन कर उनका पता लगाने की कोशिश कर रहे थे। स्वयंसेवक घायलों को प्राथमिक उपचार दिलाने में जुट गए। कुछ लोग पानी बांट रहे थे, तो कुछ घायल छात्रों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचा रहे थे।
आंदोलनकारी नेताओं ने आरोप लगाया कि कार्रवाई के बाद कई छात्रों का अपने साथियों से संपर्क टूट गया। संगठन के कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों से छात्रों की जानकारी जुटाने का प्रयास शुरू किया। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की ओर से भी सोशल मीडिया मंच X पर कुछ छात्रों के सकुशल होने की जानकारी साझा की गई और अन्य के संबंध में सूचना देने की अपील की गई। इन दावों पर संबंधित अधिकारियों की ओर से अलग-अलग समय पर प्रतिक्रियाएं आती रहीं।
घटनाक्रम के बीच मंच पर मौजूद नेताओं ने छात्रों से संयम बनाए रखने की अपील की। सीजेपी से जुड़े नेताओं का कहना था कि आंदोलन का उद्देश्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाना है। उन्होंने छात्रों से शांति बनाए रखने और एक-दूसरे की सहायता करने का आग्रह किया।
आंदोलन के दौरान कई भावुक दृश्य भी देखने को मिले। कुछ छात्र अपने घायल साथियों को कंधे पर उठाकर ले जाते दिखाई दिए। कई छात्राएं रोते हुए अपने समूह के साथियों को खोज रही थीं। दूर-दराज़ से आए अभिभावक लगातार फोन कर अपने बच्चों का हाल जानने की कोशिश कर रहे थे। कुछ स्वयंसेवक पूरी रात अलग-अलग अस्पतालों और पुलिस थानों के चक्कर लगाते रहे ताकि यदि कोई छात्र वहां हो तो उसके परिजनों को सूचना दी जा सके।
इसी बीच देशभर में इस घटनाक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे। कई स्थानों पर छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने एकजुटता प्रदर्शन किए। विभिन्न राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी। जहां आंदोलन का समर्थन करने वाले संगठनों ने पुलिस कार्रवाई की आलोचना की, वहीं प्रशासन और सरकार की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
आंदोलनकारियों का कहना है कि इन घटनाओं के कुछ ही समय बाद राष्ट्रीय राजनीति में तेज हलचल शुरू हो गई। चर्चाएं तेज हो गईं कि सरकार पर बढ़ता दबाव अब निर्णायक मोड़ ले सकता है। धरना स्थल पर मौजूद छात्रों के बीच भी तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं। कोई इसे संघर्ष का सबसे कठिन दिन बता रहा था, तो कोई कह रहा था कि अब आंदोलन अपने निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है।
उस रात जंतर-मंतर पर शायद ही किसी की आंखों में नींद रही हो। घायल साथियों की चिंता, भविष्य की अनिश्चितता और आंदोलन के अगले कदम को लेकर हर चेहरे पर अलग-अलग भाव थे। लेकिन एक बात समान थी—अधिकांश प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे पीछे हटने के लिए नहीं, बल्कि अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से अंत तक रखने के लिए आए हैं।
उधर पूरे देश की निगाहें दिल्ली पर टिक गई थीं। समाचार चैनल, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया लगातार घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए थे। यह स्पष्ट हो चुका था कि अब यह केवल एक धरना नहीं रह गया था; यह राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन चुका था।
आने वाले कुछ घंटों में घटनाएं और तेजी से बदलने वाली थीं। आंदोलन, इस्तीफे की खबरें, नेताओं के बयान और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इस संघर्ष को एक नए अध्याय की ओर ले जाने वाली थीं।
इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर गूंजा एक वाक्य— ‘मुझे हीरो मत बनाइए’: 36 दिन के संघर्ष के बाद देश की राजनीति में बड़ा मोड़
36 दिनों तक चले आंदोलन का वह क्षण आखिर आ ही गया, जिसका इंतजार हजारों छात्र, शिक्षक और आंदोलन से जुड़े लोग कई सप्ताह से कर रहे थे। जैसे ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर धरना स्थल तक पहुंची, जंतर-मंतर पर मौजूद छात्रों के बीच अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कहीं लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाया, कहीं तिरंगे लहराए गए, तो कहीं छात्रों की आंखों से आंसू बह निकले। कई प्रदर्शनकारियों ने इसे अपने संघर्ष की पहली बड़ी सफलता बताया, जबकि सरकार और भारतीय जनता पार्टी की ओर से इसे अपने राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों के संदर्भ में देखा गया।
36 दिनों तक खुले आसमान के नीचे बैठे हजारों युवाओं के लिए यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी। उनके अनुसार यह उन अनगिनत दिनों और रातों का परिणाम था, जिनमें उन्होंने गर्मी, बारिश, थकान, आर्थिक कठिनाइयों और अनिश्चित भविष्य के बीच भी अपना आंदोलन जारी रखा। कई छात्र ऐसे थे जिन्होंने पहली बार अपने घर से इतनी लंबी दूरी तय की थी। कई ऐसे भी थे जो रोज़ अपने माता-पिता को यह भरोसा दिलाते रहे कि वे सुरक्षित हैं और जल्द लौटेंगे।
इस्तीफे की खबर फैलते ही मंच के सामने बड़ी संख्या में छात्र एकत्र हो गए। नारे लगे, संविधान की प्रतियां हवा में लहराईं और एक-दूसरे को बधाई देने का सिलसिला शुरू हुआ। लेकिन इसी उत्साह के बीच सीजेपी के प्रमुख चेहरों में शामिल अभिजीत दीपके मंच पर आए और उन्होंने ऐसा संदेश दिया जिसने आंदोलन को एक अलग दिशा देने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि “मुझे हीरो मत बनाइए। यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति की वजह से सफल नहीं हुआ। लाखों छात्रों, शिक्षकों, स्वयंसेवकों, सामाजिक संगठनों और उन परिवारों ने इसे मजबूत बनाया, जिन्होंने अपने बच्चों को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के लिए दिल्ली भेजा। यदि किसी एक व्यक्ति को हीरो बनाया जाएगा, तो आंदोलन की मूल भावना कमजोर हो जाएगी।”
उन्होंने आगे यह भी कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की असली ताकत उसका सामूहिक नेतृत्व होता है। उनके इस बयान की चर्चा आंदोलन स्थल से लेकर सोशल मीडिया तक व्यापक रूप से हुई। समर्थकों ने इसे व्यक्तिगत महिमामंडन से दूर रहने की अपील के रूप में देखा, जबकि राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे संगठनात्मक संदेश बताया।
आंदोलन के दौरान मंच साझा करने वाले अन्य नेताओं—राम जी, दीपक, अभिषेक सिंह और सौरभ दास—ने भी छात्रों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन की सफलता का श्रेय उन हजारों युवाओं को जाता है, जिन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास किया। उन्होंने यह भी कहा कि संघर्ष का उद्देश्य केवल एक इस्तीफा नहीं था, बल्कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सुधार की मांग उठाना था।
सीजेपी से जुड़े नेताओं ने अपने संबोधनों में बार-बार कहा कि आंदोलन को अब भी समाप्त संघर्ष नहीं माना जाना चाहिए। उनके अनुसार यदि शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधार नहीं हुए तो भविष्य में भी लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखी जाएगी। मंच से यह संदेश भी दिया गया कि आंदोलन के दौरान घायल हुए, हिरासत में लिए गए या किसी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करने वाले छात्रों को भुलाया नहीं जाएगा।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने धर्मेंद्र प्रधान के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। पार्टी के नेताओं ने उनके कार्यकाल और योगदान की सराहना की तथा कहा कि सरकार शिक्षा सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार की ओर से भी समय-समय पर यह कहा गया कि शिक्षा क्षेत्र में सुधारों की प्रक्रिया जारी रहेगी और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी का भी उल्लेख किया।
आंदोलन के दौरान विपक्ष के कई नेताओं, सामाजिक संगठनों और छात्र समूहों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। किसी ने इसे लोकतांत्रिक संघर्ष की मिसाल बताया, तो किसी ने इसे युवाओं की नई राजनीतिक चेतना का प्रतीक कहा। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे हाल के वर्षों के महत्वपूर्ण छात्र आंदोलनों में शामिल किया, क्योंकि इसने शिक्षा और युवाओं से जुड़े प्रश्नों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
36 दिनों तक चले इस आंदोलन ने केवल राजनीतिक हलकों में ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय परिसरों, छात्रावासों, पुस्तकालयों और गांव-शहरों तक बहस छेड़ दी। अभिभावकों के बीच भी यह चर्चा का विषय रहा कि आज का युवा केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता की भी मांग कर रहा है।
आंदोलन समाप्ति की ओर बढ़ रहा था, लेकिन जंतर-मंतर की सड़कों पर बिखरे पोस्टर, भीगे हुए तिरंगे, खाली पानी की बोतलें, स्वयंसेवकों के थके चेहरे और छात्रों की आंखों में दिखाई देने वाला आत्मविश्वास इस बात की गवाही दे रहे थे कि यह संघर्ष केवल 36 दिनों की कहानी नहीं था। यह उन असंख्य युवाओं की कहानी थी, जिन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का निर्णय लिया।
हालांकि आंदोलन के समर्थक इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मान रहे थे, वहीं आगे का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही था कि आंदोलन के दौरान उठाए गए मुद्दों पर दीर्घकालिक स्तर पर क्या परिवर्तन होंगे। क्या संवाद आगे बढ़ेगा? क्या शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार होंगे? क्या आंदोलन में उठे सवालों का संस्थागत समाधान निकलेगा? इन प्रश्नों के उत्तर आने वाला समय देगा।
लेकिन इतना निश्चित है कि जंतर-मंतर की उन 36 दिनों की तस्वीरें, नारे, भाषण और संघर्ष भारतीय छात्र आंदोलनों के इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बने रहेंगे।
“36 दिन बाद बुझा आंदोलन का मंच, लेकिन करोड़ों युवाओं के मन में उठे सवाल अब भी बाकी हैं“
छत्तीस दिनों तक जंतर-मंतर पर गूंजती आवाज़ें आखिर एक दिन शांत हो गईं। मंच पर लगे माइक्रोफोन उतरने लगे, तिरंगे समेटे जाने लगे, बैनर मोड़े जाने लगे और दूर-दूर से आए छात्र अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगे। लेकिन जो चीज़ अपने साथ नहीं ले जा सके, वह थी इन 36 दिनों की यादें—वे रातें, जब फुटपाथ बिस्तर बन गया; वह बारिश, जिसने कपड़े भिगो दिए लेकिन इरादे नहीं; वह तपती दोपहर, जिसमें हजारों युवा लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के लिए डटे रहे।
जंतर-मंतर पर बीते ये दिन केवल एक धरना नहीं थे। यह उन युवाओं की कहानी थी, जो मानते थे कि लोकतंत्र में अपनी बात कहना उनका अधिकार है। देश के अलग-अलग राज्यों से आए छात्रों ने एक-दूसरे को शायद पहले कभी नहीं देखा था, लेकिन आंदोलन ने उन्हें एक साझा उद्देश्य से जोड़ दिया। किसी ने भोजन बांटा, किसी ने दवा पहुंचाई, किसी ने घायल साथी को अस्पताल तक पहुंचाया और किसी ने पूरी रात जागकर अपने साथियों की जानकारी जुटाई। संघर्ष के बीच यही मानवीय संवेदनाएं आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरीं।
आंदोलन से जुड़े नेताओं ने इसे केवल किसी एक मांग तक सीमित न मानते हुए शिक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़े व्यापक मुद्दों की आवाज़ बताया। आंदोलन के मंच से कई बार यह कहा गया कि यह संघर्ष लोकतांत्रिक संवाद, जवाबदेही और युवाओं की भागीदारी को लेकर है। वहीं सरकार ने भी समय-समय पर शिक्षा सुधारों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारियों पर जोर दिया। इस प्रकार आंदोलन ने केवल विरोध नहीं, बल्कि नीति, प्रशासन और नागरिक अधिकारों पर राष्ट्रीय स्तर की बहस को भी जन्म दिया।
इस्तीफे की खबर आने के बाद आंदोलन स्थल पर भावनाएं अपने चरम पर थीं। कुछ छात्रों ने इसे अपने संघर्ष की उपलब्धि माना, तो कुछ ने कहा कि असली परीक्षा अब शुरू होती है। कई प्रदर्शनकारियों का कहना था कि किसी एक निर्णय से सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता; आगे भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर निरंतर संवाद और सुधार की आवश्यकता रहेगी। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों और विश्लेषकों ने भी इस घटनाक्रम को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा और उसके राजनीतिक प्रभावों पर चर्चा की।
आंदोलन के दौरान सबसे अधिक चर्चा उस पीढ़ी की हुई, जिसे अक्सर केवल प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और करियर तक सीमित समझा जाता था। इस आंदोलन ने यह संकेत दिया कि देश का युवा केवल नौकरी ही नहीं, बल्कि नीति निर्माण, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही जैसे प्रश्नों पर भी अपनी राय रखना चाहता है। विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, छात्रावासों और सोशल मीडिया तक यह बहस फैल गई कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में युवाओं की आवाज़ को किस प्रकार सुना जाना चाहिए।
इन 36 दिनों में जंतर-मंतर केवल दिल्ली का एक स्थान नहीं रहा। वह देशभर से आए छात्रों की आकांक्षाओं, असहमति और उम्मीदों का प्रतीक बन गया। वहां मौजूद लोगों के लिए यह यात्रा केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि जीवन का ऐसा अनुभव थी जिसे वे शायद वर्षों तक याद रखेंगे। जिन्होंने धरना स्थल पर रातें बिताईं, जिन्होंने स्वयंसेवक के रूप में सेवा की, जिन्होंने मंच से भाषण दिए या चुपचाप भीड़ में खड़े होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई—हर व्यक्ति अपने साथ एक अलग कहानी लेकर लौटा।
इस आंदोलन ने भारतीय लोकतंत्र के सामने भी कई प्रश्न छोड़े। क्या असहमति को पर्याप्त स्थान मिल रहा है? क्या संवाद की प्रक्रियाएं और मजबूत हो सकती हैं? क्या छात्रों से जुड़े मुद्दों पर संस्थागत स्तर पर अधिक प्रभावी व्यवस्था बनाई जा सकती है? इन प्रश्नों के उत्तर किसी एक आंदोलन से नहीं मिलेंगे, लेकिन यह निश्चित है कि इस आंदोलन ने उन्हें राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया।
इतिहास का मूल्यांकन समय करता है। किसी आंदोलन की सफलता केवल तत्काल परिणामों से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक प्रभाव से भी आंकी जाती है। आने वाले वर्षों में यह देखा जाएगा कि इस आंदोलन ने शिक्षा, छात्र राजनीति और लोकतांत्रिक भागीदारी पर किस प्रकार का प्रभाव छोड़ा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जंतर-मंतर के वे 36 दिन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के उन अध्यायों में गिने जाएंगे, जिनमें युवाओं ने अपनी आवाज़ को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।
शाम ढल चुकी थी। धरना स्थल लगभग खाली हो गया था। कुछ स्वयंसेवक अंतिम बैनर समेट रहे थे। सड़क पर बिखरे पोस्टरों के बीच हवा धीरे-धीरे चल रही थी। ऐसा लग रहा था मानो जंतर-मंतर स्वयं उन आवाज़ों को याद कर रहा हो, जो पिछले 36 दिनों तक लगातार गूंजती रहीं। आंदोलन समाप्त हो गया था, लेकिन उससे जुड़े प्रश्न, अनुभव और स्मृतियां अभी भी देश की सामूहिक चेतना में जीवित थीं।
किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता होती है, और उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यह होती है कि वह असहमति की आवाज़ों को किस प्रकार सुनता है। यही प्रश्न इस आंदोलन ने देश के सामने पूरी गंभीरता के साथ रखा।
“26 दिनों की भूख हड़ताल: जब सोनम वांगचुक ने छात्रों के संघर्ष को अपना संघर्ष बना लिया“
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के 36 दिनों के इतिहास में यदि किसी एक घटना ने पूरे देश का ध्यान सबसे अधिक खींचा, तो वह थी प्रसिद्ध शिक्षाविद्, नवोन्मेषक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की 26 दिनों तक चली भूख हड़ताल। उनका यह कदम आंदोलन को नैतिक और राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान देने वाला साबित हुआ। आंदोलन को उस समय नई ऊर्जा मिली जब उन्होंने छात्रों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया।
जंतर-मंतर पर हर दिन हजारों छात्र उनकी एक झलक पाने के लिए पहुंचते थे। मंच पर लेटे सोनम वांगचुक का कमजोर होता शरीर और शांत चेहरा उन युवाओं के लिए केवल एक व्यक्ति की तस्वीर नहीं था, बल्कि एक ऐसे संघर्ष का प्रतीक बन चुका था, जिसमें देश के भविष्य को लेकर चिंता, जवाबदेही की मांग और लोकतांत्रिक आग्रह एक साथ दिखाई दे रहे थे। आंदोलन से जुड़े छात्रों का कहना था कि जब देश के एक सम्मानित शिक्षाविद् ने स्वयं भोजन त्यागकर उनके साथ खड़े होने का निर्णय लिया, तब उन्हें लगा कि उनकी आवाज़ अब केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रही।
दिन बीतने के साथ उनकी सेहत लगातार गिरती गई। चिकित्सकों की निगरानी बढ़ाई गई और अंततः उन्हें बेहतर इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। इसके बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, परीक्षा प्रणाली में सुधार और छात्रों के भविष्य की रक्षा का संदेश देना है।
भूख हड़ताल के दौरान देशभर से छात्रों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने उनके प्रति समर्थन व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थनाओं का सिलसिला चलता रहा। कई विश्वविद्यालयों में छात्रों ने एकजुटता सभाएं आयोजित कीं और शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन का समर्थन किया। आंदोलन के आयोजकों का कहना था कि वांगचुक की उपस्थिति ने इस संघर्ष को केवल छात्र आंदोलन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बना दिया।
करीब 26 दिनों तक चले अनशन के बाद केंद्र सरकार के साथ बातचीत हुई। इसके बाद केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त किया। वांगचुक ने कहा कि उन्होंने लंबी बातचीत और कुछ लिखित आश्वासनों के बाद यह निर्णय लिया तथा यह भी कहा कि देश में संभावित तनाव और हिंसा की आशंका को देखते हुए उन्होंने अनशन समाप्त करना उचित समझा।
अनशन समाप्त होने के बाद भी आंदोलन रुका नहीं। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि वांगचुक का उपवास समाप्त होना आंदोलन का अंत नहीं है और छात्रों का शांतिपूर्ण संघर्ष अपनी मांगों को लेकर जारी रहेगा।
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने इस आंदोलन को एक नैतिक आयाम दिया। समर्थकों के लिए यह केवल उपवास नहीं था, बल्कि शिक्षा, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद के पक्ष में दिया गया एक शांत लेकिन प्रभावशाली संदेश था। इतिहास इस आंदोलन का मूल्यांकन अपने ढंग से करेगा, लेकिन 26 दिनों तक चला यह अनशन उन घटनाओं में अवश्य गिना जाएगा, जिसने देशभर का ध्यान जंतर-मंतर की ओर खींचा।
जंतर-मंतर पर वे अनजान हाथ: जिन्होंने आंदोलन नहीं, इंसानियत को जिंदा रखा
इतिहास जब भी किसी आंदोलन को याद करता है, तो उसकी स्मृतियों में अक्सर मंच पर खड़े नेता, गूंजते भाषण और बड़े राजनीतिक फैसले दर्ज हो जाते हैं। लेकिन हर आंदोलन की एक ऐसी कहानी भी होती है, जो कैमरों की रोशनी से दूर रह जाती है। वह कहानी उन अनगिनत अनजान हाथों की होती है, जिन्होंने बिना किसी पहचान, बिना किसी पद और बिना किसी स्वार्थ के केवल इंसानियत का धर्म निभाया।
36 दिनों तक जंतर-मंतर पर चले छात्र आंदोलन की भी ऐसी ही एक कहानी है। यह कहानी उन स्वयंसेवकों, राहगीरों, सामाजिक संगठनों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, शिक्षकों, महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की है, जिन्होंने शायद मंच से कभी भाषण नहीं दिया, लेकिन आंदोलन की धड़कन बने रहे।
हर सुबह सूरज निकलने से पहले कुछ लोग चुपचाप पानी की बोतलें उतार जाते थे। कोई नाश्ते के पैकेट रख जाता था। कोई चाय के बड़े डिब्बे लेकर पहुंच जाता था। किसी ने फल बांटे, किसी ने बिस्कुट। किसी ने पूछा भी नहीं कि सामने खड़ा छात्र किस राज्य का है, किस भाषा में बोलता है या किस संगठन से जुड़ा है। उस समय केवल एक पहचान थी—वह एक छात्र था, और उसे मदद की जरूरत थी।
धरना स्थल पर कई ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने इंसानियत की सबसे सुंदर तस्वीर पेश की। एक बुजुर्ग महिला अपने हाथों से बने पराठे लेकर पहुंचीं। उन्होंने कहा, “बेटा, मेरे अपने बच्चे दूर रहते हैं। तुम लोग भी किसी के बच्चे हो। भूखे मत रहना।” यह सुनकर कई छात्रों की आंखें भर आईं। किसी ने उस महिला का नाम तक नहीं पूछा, लेकिन उनकी ममता आंदोलन की यादों में दर्ज हो गई।
दिन में तपती धूप होती तो कुछ स्वयंसेवक गीले तौलिये और पानी लेकर छात्रों के बीच घूमते। शाम को बारिश होती तो कोई प्लास्टिक की चादरें लेकर आ जाता। रात गहराती तो कुछ लोग कंबल बांटते दिखाई देते। दिल्ली के कई नागरिकों ने अपने घरों से भोजन बनाकर भेजा। कुछ लोग केवल इसलिए आते थे कि कहीं किसी छात्र को दवा, फोन चार्जर या घर बात करने के लिए मोबाइल की जरूरत न पड़ जाए।
आंदोलन के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कई स्वयंसेवकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राथमिक उपचार देने वाली टीमें लगातार सक्रिय रहीं। किसी को चक्कर आया तो तुरंत पानी और दवा पहुंचाई गई। किसी को चोट लगी तो पट्टी की गई। कई डॉक्टरों ने अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर निशुल्क स्वास्थ्य सहायता दी। उनके लिए सामने खड़ा व्यक्ति किसी संगठन का सदस्य नहीं, बल्कि सहायता का पात्र था।
कानूनी सहायता देने वाले अधिवक्ताओं ने भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने आंदोलनकारियों को उनके अधिकारों की जानकारी दी और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी सलाह उपलब्ध कराई। कई कानून के छात्रों ने भी स्वयंसेवक के रूप में दस्तावेज़ तैयार करने, सूचनाएं एकत्र करने और लोगों को मार्गदर्शन देने में सहयोग किया।
जंतर-मंतर की गलियों में सबसे मार्मिक दृश्य तब दिखाई देते थे, जब अलग-अलग राज्यों से आए छात्र एक-दूसरे के परिवार बन जाते थे। कोई अपने बैग से अतिरिक्त कपड़े निकालकर साथी को दे देता, कोई अपनी दवा साझा करता, तो कोई रातभर जागकर बीमार मित्र का ध्यान रखता। आंदोलन ने अनजान लोगों को भी एक-दूसरे का अपना बना दिया।
आंदोलन के दौरान कई पत्रकार भी लगातार मैदान में मौजूद रहे। कैमरे के पीछे खड़े अनेक फोटोग्राफर और रिपोर्टर घंटों धूप और बारिश में घटनाओं को दर्ज करते रहे। कई बार उन्होंने केवल खबर ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मानवीय संवेदनाएं भी दिखाई। किसी घायल को पानी देना, किसी बुजुर्ग को रास्ता दिखाना या किसी छात्र के परिवार तक सूचना पहुंचाने में मदद करना—ऐसे अनेक छोटे-छोटे दृश्य आंदोलन की मानवीय तस्वीर का हिस्सा बने।
रात के अंधेरे में जब अधिकांश लोग अपने घरों में सो रहे होते थे, तब भी जंतर-मंतर पूरी तरह नहीं सोता था। कुछ स्वयंसेवक पूरी रात पहरा देते। कोई सफाई करता, कोई कूड़ा इकट्ठा करता, कोई यह सुनिश्चित करता कि सुबह तक पीने का पानी उपलब्ध रहे। सुबह जब नए लोग पहुंचते, तो शायद उन्हें यह दिखाई नहीं देता था कि रातभर कितने अनजान हाथ उनकी सुविधा के लिए काम करते रहे।
इन अनाम सहयोगियों ने कोई सम्मान नहीं मांगा, कोई पुरस्कार नहीं चाहा और न ही अपनी तस्वीरें मंच पर लगवाईं। उनका सबसे बड़ा परिचय यही था कि जब जरूरत पड़ी, वे आगे आए। उन्होंने यह याद दिलाया कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की असली ताकत केवल नारे नहीं, बल्कि समाज की वह संवेदना होती है जो संकट की घड़ी में एक-दूसरे का हाथ थाम लेती है।
36 दिनों का आंदोलन समाप्त हो गया। मंच हट गए, भीड़ लौट गई, पोस्टर उतर गए। लेकिन जंतर-मंतर की हवा शायद आज भी उन अनजान हाथों की गर्माहट महसूस करती होगी, जिन्होंने बिना नाम पूछे पानी पिलाया, बिना पहचान जाने भोजन कराया और बिना किसी अपेक्षा के केवल इतना कहा “हिम्मत मत हारना, तुम अकेले नहीं हो।”
शायद इतिहास नेताओं के नाम याद रखे, शायद राजनीति फैसलों को याद रखे, लेकिन जंतर-मंतर की मिट्टी उन अनगिनत अनजान हाथों को कभी नहीं भूलेगी, जिन्होंने 36 दिनों तक यह साबित किया कि जब इंसानियत साथ खड़ी हो जाती है, तब कोई भी संघर्ष केवल आंदोलन नहीं रहता, वह समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव बन जाता है।

