मूकनायक/ स्वतंत्र पत्रकार नेहा पहारिया
ग्वालियर/ मध्य प्रदेश
मीडिया कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मोबाइल से फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी करने वाले लोगों के लिए यह सवाल गंभीर है कि यदि स्कूल परिसर में किसी प्रकार की घटना सामने आती है, तो उसकी सच्चाई समाज तक कैसे पहुंचेगी?
यदि किसी सरकारी स्कूल की इमारत जर्जर है, शिक्षक द्वारा बच्चों के साथ मारपीट की जाती है, बालिकाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है, जातिगत भेदभाव किया जाता है, मिड-डे-मील में अनियमितता होती है, बच्चों के बीच हिंसा या कोई गंभीर अपराध होता है अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भेदभाव या वैचारिक टकराव की घटना सामने आती है—तो ऐसी घटनाओं का प्रमाण अक्सर फोटो और वीडियो के माध्यम से ही सामने आता है।
बताया जा रहा है कि राजस्थान में स्कूल परिसर में फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए अनुमति की व्यवस्था लागू की गई है। यदि ऐसा आदेश व्यापक रूप से लागू होता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि पारदर्शिता, जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा?
स्कूल केवल सरकारी भवन नहीं हैं। वे बच्चों के अधिकार, शिक्षा, समानता और संविधान के मूल्यों से जुड़े सार्वजनिक संस्थान हैं। यदि किसी बच्चे के साथ अन्याय होता है और उसे रिकॉर्ड करने वाला कोई व्यक्ति मौजूद है, तो क्या सबसे पहले कैमरा रोकना जरूरी है या उस अन्याय को रोकना?
बेशक, बच्चों की निजता, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा जरूरी है। बिना अनुमति किसी बच्चे की पहचान सार्वजनिक करना भी उचित नहीं है। लेकिन निजता की सुरक्षा और सच्चाई को छिपाने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। नियम ऐसे होने चाहिए जो बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करें, मगर भ्रष्टाचार, हिंसा, भेदभाव या लापरवाही पर पर्दा डालने का माध्यम न बनें।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। कैमरा अपराधी नहीं होता; कई बार कैमरा ही वह गवाह बन जाता है, जिसकी वजह से पीड़ित बच्चे और परिवार को न्याय मिल पाता है।
इसलिए सरकार से सवाल है—क्या व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ाने के लिए है या घटनाओं को सामने आने से रोकने के लिए? यदि उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है तो स्पष्ट, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था बनाई जाए; मीडिया और नागरिकों की निगरानी भूमिका को पूरी तरह बाधित करने वाली व्यवस्था नहीं।
स्कूलों में कैमरे पर पहरा लगाने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों के अधिकारों, समानता, न्याय और स्वतंत्रता पर भी कोई पहरा न लग जाए।
क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल आदेश जारी करने में नहीं, बल्कि सच सामने आने देने और गलत होने पर उसे सुधारने की क्षमता में है।

