मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन को यदि मात्र समस्याओं का संग्रह मान लिया जाए तो यात्रा बोझिल लगने लगती है। वास्तव में समस्याएँ जीवन का अंत नहीं, बल्कि उसकी नई शुरुआत और आत्म-खोज की चुनौती होती हैं। समस्या का उपस्थित होना इस बात का प्रमाण है कि जीवन गतिमान है, ठहरा हुआ जल तो वैसे भी सड़ने लगता है। संघर्ष ही वह माध्यम है, जो व्यक्ति की आंतरिक क्षमताओं को निखारता है। जिस तरह सोने को तपने के बाद ही निखार मिलता है, उसी तरह विपरीत परिस्थितियाँ मनुष्य के चरित्र का निर्माण करती हैं। जब समस्याएँ सामने आती हैं तो वे हमें अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर सोचने और लड़ने का अवसर देती हैं। संघर्षहीन जीवन व्यक्ति को निष्क्रिय बना देता है, जबकि चुनौतियों से जूझना उसे मानसिक और आत्मिक रूप से सुदृढ़ बनाता है।
हर समस्या अपने साथ अपना समाधान भी लेकर आती है। आवश्यकता केवल दृष्टिकोण बदलने की होती है। जब हम समस्याओं को बाधा मानने के बजाय एक पहेली की तरह देखते हैं, तो हमारी सोच नकारात्मकता से हटकर समाधान की ओर केंद्रित होने लगती है। धैर्य, विवेक और अडिग संकल्प वे हथियार हैं, जो कठिन से कठिन परिस्थिति का भी समाधान ढूँढ निकालते हैं। जीवन की असली सुंदरता गिर जाने में नहीं, बल्कि हर बार गिरकर नए उत्साह के साथ उठ खड़े होने में है। समस्याएँ जीवन का एक अनिवार्य अध्याय ज़रूर हैं, लेकिन संपूर्ण पुस्तक नहीं। चुनौतियों को स्वीकार करना (संघर्ष) और उनका मार्ग खोजना (समाधान) ही जीवन का सच्चा पर्याय और आनंद है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

