Tuesday, September 29, 2026
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रक्षाबंधन पर विष्णु भोग चावल की राखियां बनेंगी छत्तीसगढ़ की नई पहचान

बिहान से जुड़ी महिला स्व-सहायता समूहों की अभिनव पहल, स्थानीय उत्पादों को मिलेगा नया बाजार और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भरता का संबल

इस वर्ष रक्षाबंधन पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय कृषि उत्पादों की विशिष्ट पहचान एक नई मिसाल पेश करने जा रही है। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के प्रसिद्ध विष्णु भोग धान के सुगंधित चावल से तैयार की गई आकर्षक और कलात्मक राखियां इस बार बाजार में विशेष आकर्षण का केंद्र होंगी। ये अनूठी राखियां भाई-बहन के स्नेह के प्रतीक होने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का संदेश भी देंगी।

राज्य शासन की ग्रामीण आजीविका संवर्धन योजनाओं के तहत बिहान से जुड़ी महिला स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक हस्तकला का अभिनव समन्वय करते हुए विष्णु भोग चावल से आकर्षक राखियों का निर्माण किया है। रंग-बिरंगे धागों, पारंपरिक सजावट और सुगंधित चावल के संयोजन से तैयार ये राखियां छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को देशभर तक पहुंचाने का माध्यम बनेंगी।

इस नवाचार को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा महिला स्व-सहायता समूहों की सदस्यों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें आधुनिक डिजाइन, आकर्षक राखी निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण तथा विपणन की तकनीकों से अवगत कराया गया। प्रशिक्षण के बाद महिलाएं आत्मविश्वास के साथ स्वयं राखियों का निर्माण कर रही हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता भी मजबूत हो रही है।

रक्षाबंधन के अवसर पर इन विशेष राखियों की बिक्री के लिए रेलवे स्टेशन, कलेक्ट्रेट परिसर तथा विभिन्न ग्राम संगठन परिसरों में विशेष विक्रय केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से उपभोक्ता सीधे महिला स्व-सहायता समूहों से राखियां खरीद सकेंगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम होगी और महिलाओं को उनके उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त होगा।

महिला समूहों की सदस्यों का कहना है कि विष्णु भोग चावल से राखी निर्माण उनके लिए केवल अतिरिक्त आय का साधन नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मकता, आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान को नई दिशा देने वाला प्रयास है। स्थानीय संसाधनों पर आधारित ऐसे नवाचार ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर भी सृजित कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय कृषि उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प को इस प्रकार नवाचार के साथ बाजार उपलब्ध कराने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। साथ ही गौरेला-पेंड्रा-मरवाही का प्रसिद्ध विष्णु भोग चावल प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करेगा। यह स्थानीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।

इस रक्षाबंधन पर विष्णु भोग चावल से बनी ये अनूठी राखियां केवल भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक नहीं होंगी, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’, महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय उत्पादों के संरक्षण का सशक्त संदेश भी देंगी। यह पहल दर्शाती है कि पारंपरिक कृषि उत्पादों और स्थानीय कला का समन्वय ग्रामीण आजीविका, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

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