
गुरु पूर्णिमा एवं प्रथम धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर श्रद्धा, साधना और धम्म के संदेश के साथ हुआ आयोजन
दमोह (बालाघाट), 29 जुलाई। गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा) एवं प्रथम धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के पावन अवसर पर प्रज्ञादीप बुद्ध विहार, दमोह में पूज्य भंते बोधि धम्म के 11वें वर्षावास का शुभारंभ श्रद्धा, भक्ति और धम्म साधना के वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ परित्राण पाठ तथा त्रिशरण-पंचशील ग्रहण के साथ हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उपासक-उपासिकाओं ने सहभागिता करते हुए धम्म मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

पूज्य भंते बोधि धम्म वर्ष 2015 से प्रज्ञादीप बुद्ध विहार, दमोह में निरंतर वर्षावास कर रहे हैं। उनका लगातार 11वाँ वर्षावास क्षेत्र के बौद्ध समाज के लिए आध्यात्मिक साधना, अध्ययन और धम्म प्रचार का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।
कार्यक्रम में एस.आर. उके ने आषाढ़ पूर्णिमा के बौद्ध महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह दिवस भगवान बुद्ध के जीवन और बौद्ध परंपरा की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। इसी पावन तिथि पर भगवान बुद्ध ने सारनाथ के ऋषिपत्तन मृगदाय में पंचवर्गीय भिक्षुओं को प्रथम उपदेश देकर धम्मचक्र प्रवर्तन किया था, जिससे विश्व में धम्म के प्रचार-प्रसार का शुभारंभ हुआ। इसी दिन भिक्षु संघ की स्थापना हुई तथा वर्षावास की परंपरा भी प्रारंभ होती है।
वक्ताओं ने श्रद्धालुओं से वर्षावास अवधि में पंचशील एवं अष्टशील का पालन करने, नियमित बुद्ध वंदना, धम्म श्रवण, ध्यान साधना तथा मैत्री, करुणा और सदाचार को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। साथ ही वर्षावास के दौरान अन्य भिक्षुओं को आमंत्रित कर अधिकाधिक लोगों को धम्मदेशना एवं साधना का लाभ उपलब्ध कराने का आग्रह भी किया गया।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में आयुष्मान पाण्डूलाल रामटेके, तेजलाल उके, सुखचैन सत्यटेके, हरिशंकर भेलावे, एस.आर. उके, गोपाल रामटेके, सुन्दरलाल खोबरागड़े, दिलीप डोंगरे, आयुष्मति वंदना भेलावे, निर्मला रामटेके तथा आयुष्मति रामटेके का विशेष योगदान रहा।
समापन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान बुद्ध के बताए शील, समाधि और प्रज्ञा के मार्ग पर चलने, सामाजिक समरसता, करुणा एवं मानव कल्याण के लिए कार्य करने तथा वर्षावास अवधि का सदुपयोग धम्म साधना में करने का सामूहिक संकल्प लिया।

