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झलकारी बाई कोरी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की एक महान वीरांगना थी। वह रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना की सेनापति और उनकी प्रमुख सलाहकार थी।
उनकी पुण्यतिथि पर मानव विकास संस्थान, उत्तर प्रदेश की ओर से शत शत नमन वंदन के साथ श्रद्धा सुमन समर्पित।
झलकारी बाई कोरी का जन्म 22 नवंबर 1830 को ग्राम भोजला जिला-झांसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिताजी का नाम सादोबा सिंह कोरी और माता का नाम जमुना देवी था। वह एक साहसी महिला थी, क्योंकि बचपन में ही मां के निधन के बाद उनके पिता ने ही उन्हें पाला -पोशा था। घर के काम-काज के अलावा उनके पिता ने घुड़सवारी, तीरंदाजी तथा तलवारबाजी में निपुणता हासिल कराई। एक बार जंगल में लकड़ी काटने के लिए गई थी। जहां उन पर एक तेंदुए ने आक्रमण करना चाहा।तभी वे उस तेंदुए से भिड़ गईं और उन्होंने कुल्हाड़ी से उसे मार गिराया था। उसे पीठ पर लाद कर ले आईं। जिसे सुनकर पूरे झांसी शहर में उनकी खूब प्रसंशा हुई।
झलकारी बाई कोरी का विवाह पूरन सिंह कोरी के साथ 1843 ई.में हुआ था। यह विवाह बुंदेलखंड के लोक रीति- रिवाजों के अनुसार एक सामान्य और सादगी पूर्ण पारिवारिक समारोह में हुआ था। जो कालांतर में इतिहास में एक महान क्रांतिकारी दंपति के मिलन का साक्षी बना। पूरन सिंह कोरी झांसी की सेना में सैनिक थे। उनके माध्यम से झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई के दरबार में पहुंची। झलकारी बाई का कद-काठी और शक्ल- सूरत रानी लक्ष्मीबाई से बहुत मिलती-जुलती थी। जब रानी को उनकी बहादुरी और युद्ध कौशल के बारे में पता चला तो रानी लक्ष्मीबाई बहुत ही प्रभावित हुईं और इन्हें अपनी महिला सेना "दुर्गा दल" की सेनापति और अपनी प्रमुख सलाहकार नियुक्त कर लिया।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब अंग्रेजों ने झांसी के किले को घेर लिया तो झलकारी बाई ने रानी का वेश धारण कर अंग्रेजों को भ्रमित किया और रानी लक्ष्मीबाई को सुरक्षित किले से निकलने में मदद की।
युद्ध के दौरान उनके पति पूरन सिंह झांसी के मुख्य द्वार और तोपखाने की रक्षा करते हुए ब्रिटिश सैनिकों से
बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
अपने पति की शहादत की खबर सुनकर झलकारी बाई और भी अधिक आक्रामक हो गईं। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखने के कारण शत्रु को गुमराह करने के लिए अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए अंग्रेजों के हाथों पकड़ी गईं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। वे एक घायल शेरनी की तरह अंग्रेजों से लड़ती रहीं। अंततः अंग्रेजों से लड़ते हुए 04 अप्रैल1857 में शहीद हो गईं।
लक्ष्मीबाई कभी भी अंग्रेजों से नहीं लड़ी बल्कि उसके भेष में बहुजन समाज की कोरी जाति की झलकारी बाई ही बहादुरी से लड़ी। बल्कि लक्ष्मीबाई किले के भंडारी गेट से भागती हुई मारी गई। ब्राह्मण इतिहासकारों ने झांसी की ब्राह्मणकन्या लक्ष्मीबाई, जो कि रानी भी नहीं थी बल्कि मामूली जागीरदारन थी, को न केवल रानी करार दिया बल्कि उसके किले के तट से घोड़े के साथ छलाँग लगाने की बात का भी झूठा प्रचार किया। लक्ष्मीबाई को घोड़े पर ठीक से बैठना भी नहीं आता था।
घोड़े पर बैठने के लिए उसे सहायकों की मदद दरकार थी। अंग्रेजों के हमला करने के बाद अंग्रेजों से लड़ना तो दूर वह अपनी जान बचाने भाग खड़ी हुई। उसके बावजूद झलकारी बाई की युद्ध कला में निपुणता निर्भीकता और वीरता देख कर अंग्रेज सेनापति आश्चर्यचकित हो उठे।
मचा झाँसी में घमासान चहुँ ओर मची किलकारी थी।
अँग्रेजों से लोहा लेने रण में कूदी झलकारी थी।।
मचा झाँसी में घमासान चहुँ ओर मची किलकारी थी।
अँग्रेजों से लोहा लेने रण में कूदी झलकारी थी।।
जाकर रण में ललकारी थी वह तो झाँसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गयी रानी बन जौहर दिखा गयी है
इतिहास में झलक रही वह भारत की सन्नारी थी।।
बुंदेलखंड के इतिहास में उनकी वीरता को अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है। कहते हैं कि उनकी स्मृति में झांसी और ग्वालियर में उनकी समाधि बनी हुई है।
डॉ. जी. पी. मानव
सेवा निवृत्त उप प्राचार्य
(केन्द्रीय विद्यालय संगठन, भारत सरकार, नई-दिल्ली)
संस्थापक/ अध्यक्ष
मानव विकास संस्थान, उत्तर प्रदेश।

