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माता रमाबाई अम्बेडकर करुणामई, ममतामई, स्नेह, दया ,वात्सल्य, त्याग- मूर्ति, भारतीय महिलाओं की प्रेरणा स्रोत, तपस्विनी, विश्व वंदनीय, ज्ञानपुंज बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को साधारण मानव से महामानव बनने में माता रमाबाई अम्बेडकर का जीवन साहचर्य निश्चय ही अभूतपूर्व है। समाज व राष्ट्रहित में उनका त्याग और बलिदान अविस्मरणीय है। ऐसी महान मात्रृशक्ति के स्मृति दिवस विशेष
पर हम मानव विकास संस्थान की ओर से नमन वंदन के साथ श्रद्धा सुमन समर्पित करते हैं।
माता रमाई अम्बेडकर अगर आपने साथ ना निभाया होता तो बाबा साहेब न लिख पाते भारत का संविधान, न हम मुक्त हो पाते दलदल से, ये न रुकता हमारा सदियों पुराना दमन।
हम हो जाते बिना कफन मिट्टी में कब के दफन।। न हमारे पास अच्छा भोजन होता, न अच्छे कपड़े होते, न होता हमारा अच्छा रहनो सहन।। माता आई रमाबाई आपको हम सब आपकी पुण्यतिथि पर करते हैं नमन। ।।
माता रमाबाई का जन्म 07फरवरी 1898 ई.में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के दापोली के निकट वणंद गांव में नदी किनारे महारपुरा बस्ती में एक गरीब परिवार में हुआ था। माता का नाम रुक्मणी था। पिता भीखू जी धुत्रे बंदरगाह में मछलियों से भरी हुई टोकरियां बाजार में पहुंचाते थे। यानी कुलीगिरी का काम करते थे। जिसके कारण उन्हें छाती में दर्द रहने लगा था। बचपन में ही माता की बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। माता के निधन से बच्ची रमाबाई के मन पर आघात पहुंचा और भाई शंकर बहुत ही छोटे थे। आगे चलकर कुछ दिनों बाद उनके पिता का भी निधन हो गया। उसके बाद वलंगकर चाचा और गोविंदपुरकर मामा इन सब बच्चों को लेकर मुंबई में भायखला चाल में रहने लगे। रमाई के बचपन का नाम रामी था। उनका स्वभाव अत्यंत सरल, शान्त, सच्चरित्र व शालीन था। उन्हें छल कपट कतई मंजूर न था। ईमानदारी ही उनके जीवन का आधार था।वह अतीव सुन्दर तो थी, किन्तु शिक्षित नहीं थी। रामी की दो बहने और एक भाई शंकर था।
बाल विवाह प्रथा के अनुसार रमाबाई की उम्र 9 वर्ष और बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर की उम्र 14 वर्ष की थी। तब उनका विवाह 1906 में संपन्न हुआ था।
बाबा साहेब कई बार प्राथमिक पुस्तकें लेकर माता रमाबाई को पढ़ाने का प्रयास करते, किंतु सब बेकार। बहुत मेहनत करके बाबा साहेब ने उन्हें हस्ताक्षर करना सिखा दिया था। जब बाबा साहेब अमेरिका में थे, तो माता रमाबाई ने अखबार के मोटे-मोटे अक्षर पढ़ने- लिखने सीख लिए थे। कुछ भी हो मगर अक्षर ज्ञान की तुलना में माता रमाबाई मानसिक रूप से बहुत जागरूक थीं । बाबा साहेब का उल्लेख वह हमेशा साहेब संबोधन करके अपना आदर व्यक्त करती थीं। बाबा साहेब भी उन्हें प्यार से रामू कहते थे। विलायत से जब वे पत्र लिखते ,तो प्रियतम रामू! लिखकर उन्हें संबोधित करते। इस बात से बाबा साहेब का अपनी प्रिय पत्नी के प्रति असीम स्नेह और सौहार्द का परिचय मिलता था।
बाबा साहेब के सकुशल भारत लौट आने पर माता रमाबाई को विशेष प्रसन्नता हुई। इस प्रसन्नता का कारण यह था कि जब बाबा साहेब उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जा रहे थे, तो रमाबाई की सहेलियों ने यह कहकर रमाबाई के कान भर दिए थे कि रमा! डॉ. अम्बेडकर को विदेश जाने से रोको,वरना वे विदेश से किसी मैम को ब्याह कर ले आएंगे और तू उनका मुंह देखते रह जाएगी। उस समय माता रमाबाई ने बहुत बहादुरी दिखाते हुए अपने पति में पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए यही उत्तर दिया था कि “मैं अपने साहेब को अच्छी तरह जानती हूं, वे दूसरी औरत के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते” बाबा साहेब के विदेश से ठीक-ठाक वापस लौट आने पर रमाबाई को बाबा साहेब पर और अधिक स्नेह गर्व होने लगा था।
माता रमाबाई अम्बेडकर एक कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी, गंभीर और बुद्धिजीवी महिला थीं। वे संतोष, सहयोग और सहनशीलता की मूर्ति थी। घर की बहुत ही सुनियोजित ढंग से देखभाल करती थी। माता रमाबाई अम्बेडकर ने प्रत्येक कठिनाई का सामना किया। उन्होंने गरीबी और अभावग्रस्त दिन भी बहुत साहस के साथ व्यतीत किये। जब बाबा साहेब उच्च शिक्षा के लिए विदेश (लंदन और अमेरिका) गए। तब रमाबाई ने घोर गरीबी में अपना जीवन बिताया। उन्होंने अभाव में रहकर घर चलाया और अपने बच्चों की मृत्यु का असहनीय दु:ख भी झेला। बाबा साहेब के विदेश प्रवास के दौरान कई बार उनके परिवार को आधा पेट खाकर सोना पड़ता था। घर खर्च चलाने के लिए उन्होंने लकड़ी बीनने और गोबर के कंडे (उपले) बनाने जैसे कार्य किये। माता रमाबाई अम्बेडकर अपना घर खर्च चलाने में बहुत ही किफा़यत बरतती और कुछ पैसा जमा भी करती थी क्योंकि उन्हें मालूम था कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए पैसे की जरूरत होगी। उन्होंने कभी भी घरेलू परेशानियों को बाबा साहेब के सामाजिक कार्यों और उनकी पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया।
माता रमाबाई अम्बेडकर सदाचारी और धार्मिक प्रवृत्ति की गृहणी थी। उन्हें पंढरपुर जाने की बहुत इच्छा रही। महाराष्ट्र के पंढरपुर में विट्ठल रुक्मिणी का प्रसिद्ध मंदिर है। मगर तब हिन्दू मंदिरों में अछूतों के प्रवेश की मनाही थी। बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर माता रमाबाई को समझाते थे कि ऐसे मंदिरों में जाने से उनका उद्धार नहीं हो सकता है। जहां हमें अंदर जाने की मनाही हो।
बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’ पुस्तक करुणामूर्ति रमाई को ही भेंट की। भेंट के शब्द इस प्रकार थे। (मैं यह पुस्तक) रमा को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सद्वृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दु:ख झेलने में अभाव परेशानी के दिनों में जबकि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरूप भेंट करता हूं। उपरोक्त शब्दों से स्पष्ट है कि करुणामूर्ति माता रमाबाई ने बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का किस प्रकार संकट के दिनों में साथ दिया और डॉ. अम्बेडकर के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था।
माता रमाबाई ने चार पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। जिसमें बड़ा बेटा यशवंत राव अम्बेडकर जीवित बचा था और राजरत्न, गंगाधर, रमेश और इन्दू ये सभी दवाई के अभाव में नहीं बचे।
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का पारिवारिक जीवन उत्तरोत्तर दु:ख पूर्ण होते जा रहा था।
27-05-1935 को माता रमाबाई अम्बेडकर ने बाबासाहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर का साथ छोड़ दिया अर्थात् परिनिर्वाण हो गया। उनके निधन के बाद बाबा साहेब बहुत टूट गए थे और उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने अपनी पत्नी के संघर्षों को याद रखा। दलित शोषित समाज और उनके अनुयाई उन्हें माता रमाई के नाम से अत्यंत सम्मान के साथ याद करते हैं।
आप सभी एहसास कीजिए कि माता रमाबाई व बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर का हम लोगों के ऊपर बहुत सारा कर्ज है। उसे उतारने के लिए हम सभी समाज की सेवा करें। परिश्रमी बनें, शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष दें, तभी हमारा समाज और देश उन्नतशील बनेगा।
समाज से जुड़ो, समाज को जोड़ो, जातिवाद- पाखंड से नाता तोड़ो।।
माता रमाबाई अम्बेडकर- अमर रहें।
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर -अमर रहें।
डॉ.जी. पी.मानव
सेवा निवृत्त उप प्राचार्य, (केन्द्रीय विद्यालय संगठन, भारत सरकार, नई- दिल्ली)
संस्थापक एवं वर्तमान अध्यक्ष
मानव विकास संस्थान, उत्तर प्रदेश

