नई दिल्ली। भारत की बैंकिंग व्यवस्था को हमेशा सार्वजनिक विश्वास की रीढ़ माना गया है। सरकारी बैंक केवल आर्थिक लेनदेन के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था का प्रतीक भी हैं जहाँ एक साधारण नागरिक और एक प्रभावशाली व्यक्ति को समान अधिकार मिलने चाहिए। बैंक की कतार में खड़ा किसान, मजदूर, पेंशनभोगी, छात्र, छोटा दुकानदार और बड़ा व्यापारी — सभी कानून और व्यवस्था की दृष्टि में समान ग्राहक माने जाते हैं। लेकिन देश के अनेक सरकारी बैंकों से लगातार सामने आ रही तस्वीरें और अनुभव एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं कि क्या व्यवहारिक स्तर पर यह समानता वास्तव में बची हुई है, या फिर बैंकिंग व्यवस्था भी धीरे-धीरे “वीआईपी संस्कृति” की गिरफ्त में आती जा रही है?
आज देश के कई शहरों और कस्बों में बैंक शाखाओं के भीतर एक आम दृश्य देखने को मिलता है। सामान्य ग्राहक लंबी कतारों में घंटों खड़े रहते हैं, टोकन का इंतजार करते हैं और अपनी बारी आने तक बैंक कर्मचारियों के निर्देशों का पालन करते हैं। दूसरी ओर कुछ प्रभावशाली व्यापारी, स्थानीय नेताओं से जुड़े लोग या पहचान रखने वाले ग्राहक सीधे कैश विंडो या कर्मचारियों तक पहुँच जाते हैं। कई बार उनका पैसा उसी काउंटर से जमा या निकासी होता है जहाँ आम लोग लाइन लगाकर खड़े रहते हैं। यह व्यवस्था किसी अलग “रिलेशनशिप मैनेजर” या “विशेष सेवा डेस्क” के माध्यम से नहीं चलती, बल्कि सामान्य ग्राहक के सामने ही होती है। यही दृश्य सबसे अधिक असंतोष पैदा करता है, क्योंकि इससे आम नागरिक के मन में यह भावना जन्म लेती है कि बैंकिंग व्यवस्था अब समान नियमों पर नहीं चल रही।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि व्यापारी बड़ा लेनदेन करते हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि यदि बैंक को किसी विशेष श्रेणी के ग्राहकों के लिए अलग व्यवस्था बनानी है, तो क्या वह व्यवस्था पारदर्शी और आधिकारिक रूप से लागू की गई है? यदि bulk transaction या सुरक्षा कारणों से अलग प्रक्रिया आवश्यक है, तो उसके लिए अलग काउंटर, निर्धारित समय या स्पष्ट सूचना बोर्ड होने चाहिए। लेकिन जब कुछ लोग सीधे अंदर जाकर अपना कार्य करवा लेते हैं और बाकी ग्राहक लाइन में खड़े रह जाते हैं, तो यह व्यवस्था निष्पक्षता की भावना को कमजोर करती है।
Reserve Bank of India की ग्राहक सेवा संबंधी गाइडलाइन बैंकों को सभी ग्राहकों के साथ निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवहार करने की सलाह देती हैं। RBI ने वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांग व्यक्तियों और विशेष आवश्यकता वाले ग्राहकों को सुविधा देने पर विशेष जोर दिया है। लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दिशा-निर्देशों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि प्रभाव, राजनीतिक पहचान या सामाजिक दबाव के आधार पर किसी ग्राहक को लाइन से अलग प्राथमिकता दी जाए। यही कारण है कि बैंक शाखाओं में दिखाई देने वाली ऐसी व्यवस्थाएँ आम नागरिकों के भीतर असमानता की भावना पैदा करती हैं।
दरअसल समस्या केवल बैंकिंग प्रक्रिया की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो धीरे-धीरे सरकारी संस्थानों में गहराती जा रही है। भारत में “पहचान संस्कृति” कोई नई बात नहीं है। जिन लोगों की स्थानीय स्तर पर पहुँच मजबूत होती है, वे अक्सर सामान्य प्रक्रिया से अलग सुविधाएँ प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन जब यही प्रवृत्ति बैंक जैसी संवेदनशील वित्तीय संस्था में दिखाई देती है, तो इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो जाता है। बैंक आम नागरिक के आर्थिक जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। यहाँ यदि समानता कमजोर होती दिखाई दे, तो जनता का संस्थागत विश्वास भी कमजोर होने लगता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि बैंकिंग व्यवस्था में असमानता केवल सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि सम्मान का प्रश्न भी है। जब एक वृद्ध व्यक्ति, मजदूर या पेंशनभोगी घंटों लाइन में खड़ा रहता है और उसके सामने कोई प्रभावशाली व्यक्ति सीधे अंदर जाकर कुछ मिनटों में अपना काम करवा लेता है, तो इससे केवल समय की हानि नहीं होती, बल्कि आम नागरिक का आत्मसम्मान भी प्रभावित होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी संस्थानों का सबसे बड़ा दायित्व यही होता है कि वे हर नागरिक को समान महत्व दें। यदि आम लोगों को यह महसूस होने लगे कि सरकारी संस्थाओं में पहचान और प्रभाव नियमों से अधिक शक्तिशाली हो चुके हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी चिंता का विषय है।
हालाँकि यह भी सच है कि बैंकों के सामने व्यावहारिक चुनौतियाँ होती हैं। बड़े व्यापारिक लेनदेन, भारी नकदी प्रबंधन और सुरक्षा संबंधी कारणों से कभी-कभी अलग व्यवस्था की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन ऐसी किसी भी व्यवस्था को पारदर्शी बनाना बैंक प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि विशेष प्रक्रिया लागू की जाती है, तो उसकी जानकारी सभी ग्राहकों को होनी चाहिए। अन्यथा, अनौपचारिक प्राथमिकता व्यवस्था हमेशा संदेह और असंतोष को जन्म देगी।
आज आवश्यकता केवल नियम बनाने की नहीं, बल्कि व्यवहारिक सुधार की है। बैंक शाखाओं में डिजिटल टोकन प्रणाली को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। bulk transaction के लिए अलग व्यवस्था हो तो उसका स्पष्ट सार्वजनिक उल्लेख होना चाहिए। कर्मचारियों को ग्राहक सेवा और समान व्यवहार के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बैंक के भीतर ऐसा वातावरण बनना चाहिए जहाँ कोई भी ग्राहक स्वयं को दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस न करे।
सरकारी बैंक केवल वित्तीय संस्थाएँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समानता और सार्वजनिक विश्वास के प्रतीक हैं। यदि इन संस्थाओं के भीतर ही आम नागरिक को यह महसूस होने लगे कि कतार केवल उसके लिए है और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग रास्ते खुले हैं, तो यह स्थिति केवल बैंकिंग व्यवस्था की नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास की भी चुनौती बन जाती है। इसलिए समय की माँग है कि बैंकिंग व्यवस्था में निष्पक्षता केवल कागज़ों तक सीमित न रहे, बल्कि शाखाओं के भीतर व्यवहारिक रूप में भी दिखाई दे। तभी जनता का भरोसा मजबूत रहेगा और सरकारी बैंक वास्तव में “जनता के बैंक” कहलाने का नैतिक अधिकार बनाए रख पाएँगे।
विजयराम आजाद
उप सम्पादक मूकनायक।

