देश में चुनाव समाप्त होते ही आर्थिक बहस एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गई है। चुनावी रैलियों, सरकारी विज्ञापनों और बड़े-बड़े दावों के बीच जिस आर्थिक सच्चाई को लगातार चमकदार नारों से ढकने की कोशिश की गई, वह अब धीरे-धीरे जनता की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देने लगी है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव तक देश को “विश्वगुरु”, “अमृतकाल” और “नई आर्थिक महाशक्ति” के सपने दिखाए गए, लेकिन जैसे ही मतदान खत्म हुआ, वैसे ही महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक सुस्ती की असल तस्वीर सामने आने लगी। सवाल केवल इतना नहीं है कि अर्थव्यवस्था धीमी हुई है या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार ने चुनावी माहौल बनाए रखने के लिए वास्तविक आर्थिक समस्याओं को जनता से छिपाने का प्रयास किया? विपक्ष का कहना है कि “सरकार ने कैमरों के सामने विकास दिखाया, लेकिन बाजार में सन्नाटा और युवाओं की बेरोजगारी छिपा नहीं सकी।” पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने देश को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताने में कोई कमी नहीं छोड़ी। विदेशी निवेश, एक्सप्रेस-वे, डिजिटल इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को विकास के प्रतीक के रूप में पेश किया गया, लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि यदि विकास वास्तव में इतना व्यापक था तो आम आदमी की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर क्यों होती गई? देश का मध्यम वर्ग आज सबसे अधिक दबाव में दिखाई देता है। उसकी आय सीमित है लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान आम परिवार की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। छोटे दुकानदारों का व्यापार कमजोर पड़ा है और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सिकुड़ते दिखाई दे रहे हैं। विपक्षी दलों का तंज है कि “चुनाव तक देश सुपरपावर बन रहा था, लेकिन वोटिंग खत्म होते ही जनता को राशन और रोजगार की चिंता फिर याद आ गई।” देश का युवा आज सबसे ज्यादा निराश दिखाई देता है। करोड़ों युवाओं को उम्मीद थी कि नई अर्थव्यवस्था और बड़े निवेशों से रोजगार के अवसर पैदा होंगे, लेकिन स्थिति इसके उलट नजर आती है। सरकारी नौकरियों में भर्तियां सीमित होती गईं, परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले बढ़े और निजी क्षेत्र में स्थायी नौकरियों की जगह अस्थायी रोजगार का चलन तेज हुआ। विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि यदि अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है तो फिर लाखों शिक्षित युवा नौकरी के लिए सड़कों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? क्यों रेलवे, सेना और अन्य सरकारी भर्तियों में युवाओं को वर्षों इंतजार करना पड़ रहा है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बेरोजगारी केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संकट भी बनती जा रही है। बेरोजगार युवा धीरे-धीरे सरकार के सबसे बड़े आलोचक में बदल सकता है, यही कारण है कि विपक्ष इस मुद्दे को लगातार केंद्र में रखने की कोशिश कर रहा है। महंगाई आज वह सच्चाई है जिसे किसी सरकारी विज्ञापन से छिपाया नहीं जा सकता। गांव से लेकर शहर तक हर परिवार बढ़ती कीमतों से परेशान है। खाने-पीने की चीजें, दूध, दाल, तेल, सब्जियां और दवाइयां लगातार महंगी होती जा रही हैं। विपक्ष आरोप लगाता है कि सरकार ने चुनाव तक महंगाई पर चर्चा को राष्ट्रवाद और धार्मिक मुद्दों के शोर में दबाए रखा, लेकिन अब जनता सीधे सवाल पूछ रही है कि आखिर उसकी आमदनी क्यों नहीं बढ़ रही जबकि खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं? कई विपक्षी नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि “टीवी पर भारत चमक रहा है, लेकिन रसोई में चूल्हा महंगाई से बुझ रहा है।” सरकार बार-बार GDP वृद्धि दर को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करती है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि क्या केवल GDP बढ़ने से आम जनता की जिंदगी बेहतर हो जाती है? यदि देश की संपत्ति कुछ बड़े उद्योगपतियों के हाथों में सिमटती जाए और आम आदमी की क्रय शक्ति घटती जाए, तो विकास का लाभ किसे मिल रहा है? विपक्ष इसी मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहता है कि “कुछ उद्योगपति लगातार अमीर होते गए, जबकि आम आदमी EMI और महंगाई में दबता गया।” विपक्ष यह आरोप भी लगाता है कि सरकार की आर्थिक नीतियां बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हित में अधिक दिखाई देती हैं जबकि छोटे व्यापारी और किसान लगातार संघर्ष कर रहे हैं। भारत की बड़ी आबादी आज भी गांवों में रहती है और कृषि पर निर्भर है, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति लगातार चिंता पैदा कर रही है। खेती की लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा। डीजल, खाद और बिजली की कीमतों ने खेती को और महंगा बना दिया है। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि यदि सरकार वास्तव में किसानों की आय दोगुनी करने में सफल हुई है तो फिर किसानों के आंदोलन लगातार क्यों होते रहे और गांवों से शहरों की ओर पलायन क्यों बढ़ रहा है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण संकट आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में भावनात्मक मुद्दों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। धर्म, राष्ट्रवाद, सुरक्षा और बड़े आयोजनों की राजनीति ने आर्थिक मुद्दों को पीछे धकेल दिया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर जनता का ध्यान आर्थिक संकट से हटाने के लिए भावनात्मक मुद्दों को हवा दी। विपक्षी नेताओं का कहना है कि “जब जनता रोजगार पूछती है तब उसे मंदिर दिखाया जाता है, और जब महंगाई पर सवाल उठते हैं तब राष्ट्रवाद का शोर बढ़ा दिया जाता है।” हालांकि सरकार समर्थकों का तर्क है कि मजबूत राष्ट्रवाद और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स भी विकास का हिस्सा हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि केवल प्रतीकात्मक उपलब्धियों से जनता की आर्थिक परेशानियां दूर नहीं होतीं। विपक्ष लगातार मुख्यधारा मीडिया पर भी सवाल उठाता रहा है। आरोप लगाया जाता है कि चुनाव के दौरान आर्थिक मुद्दों की बजाय धार्मिक और राजनीतिक विवादों को अधिक दिखाया गया। बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याएं टीवी बहसों से लगभग गायब रहीं। सोशल मीडिया पर भी यह तंज खूब वायरल हुआ कि “न्यूज चैनलों पर देश दुनिया जीत रहा था, लेकिन घर में सिलेंडर भरवाना मुश्किल हो गया।” राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय तक केवल भावनात्मक मुद्दों के सहारे राजनीति नहीं चल सकती क्योंकि अंततः जनता अपनी आर्थिक स्थिति के आधार पर सरकारों का मूल्यांकन करती है। यदि रोजगार नहीं बढ़े, महंगाई कम नहीं हुई और मध्यम वर्ग तथा गरीबों को राहत नहीं मिली तो आने वाले चुनावों में आर्थिक मुद्दे सबसे बड़ा हथियार बन सकते हैं। इतिहास गवाह है कि भारत की राजनीति में महंगाई और बेरोजगारी ने कई मजबूत सरकारों को कमजोर किया है। जनता कुछ समय तक नारों और प्रचार से प्रभावित हो सकती है, लेकिन अंततः रसोई, जेब और रोजगार की सच्चाई ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनती है। भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां चुनावी प्रचार और आर्थिक वास्तविकता के बीच का अंतर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। सरकार विकास की तस्वीर दिखा रही है जबकि विपक्ष आर्थिक संकट की चेतावनी दे रहा है। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है, लेकिन इतना तय है कि आम जनता की आर्थिक परेशानियां अब राजनीतिक बहस के केंद्र में लौटती दिखाई दे रही हैं। लोकतंत्र में सरकार की असली परीक्षा चुनाव जीतने से नहीं बल्कि जनता की जिंदगी आसान बनाने से होती है। यदि महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता बढ़ती रही तो आने वाले समय में जनता केवल भाषण नहीं बल्कि अपनी जेब की सच्चाई के आधार पर फैसला करेगी।
विजयराम आजाद
उप सम्पादक मूकनायक

