मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर देखने में आया है कि हम बाहर की दुनिया में अपनी छवि सुधारने, गैरों को प्रभावित करने और अपनी मिठास से अजनबियों का दिल जीतने में माहिर होते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वही ‘हुनर’ हमारे अपने घर या निजी रिश्तों में फीका पड़ने लगता है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जिनसे हमारा खून का या गहरा दिल का रिश्ता है, उनके साथ हम धैर्य और प्रेम का वह बर्ताव नहीं कर पाते, जो हम बाहर वालों को दिखाते हैं? जब हम गैरों से मिलते हैं, तो हम एक मुखौटा शिष्टाचार, धैर्य और औपचारिकता का पहनते हैं, लेकिन अपनों के सामने हम पूरी तरह से “लापरवाह” हो जाते हैं क्योंकि हम मान लेते हैं कि वे तो ‘अपने’ ही हैं। हम उनके धैर्य की परीक्षा लेने लगते हैं और अक्सर यहीं से दरार पैदा होनी शुरू होती है। “जिन्दगी में बेशक हर मौके का फायदा उठाओ, मगर किसी के भरोसे का नहीं।”
भरोसा कांच की तरह होता है। अगर यह टूट जाए, तो इसे जोड़ा तो जा सकता है, परंतु उसमें पड़ी दरारें उम्र भर के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं। जुड़ा हुआ कांच कभी पहले जैसा पारदर्शी नहीं होता। हमें यह समझने की जरूरत है कि ‘अपने’ वो नहीं हैं, जो सिर्फ सुख में साथ हों, बल्कि वो हैं जिन्होंने हम पर तब भरोसा किया, जब दुनिया हम पर संदेह कर रही थी। ऐसे लोगों के भरोसे को बचाए रखना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वक्त और विश्वास को सम्मान देना सीखें क्योंकि जब ये दोनों चले जाते हैं, तो पीछे केवल पछतावा बचता है। याद रखें, हुनर वही सच्चा है, जो अपनों के चेहरे पर मुस्कान ला सके और अपनों के दिल में आपकी जगह को सुरक्षित रख सके।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

