मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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बचपन की वह बेफिक्र हँसी, जो कभी हमारा स्वाभाविक गुण थी, पारिवारिक जिम्मेदारियों के आते ही कहीं ओझल होने लगती है क्योंकि घर की जरूरतों, बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की दवाइयों और रसोई के खर्चों को पूरा करने की जद्दोजहद में व्यक्ति एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाता है, जहाँ ‘स्वयं’ के लिए कोई स्थान नहीं बचता। ऐसी स्थिति में परिवार का पालन-पोषण करने वाला व्यक्ति अक्सर अपने चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान ओढ़े रहता है। वह नहीं चाहता कि उसके संघर्ष की आंच उसके बच्चों या जीवनसाथी तक पहुँचे । जिम्मेदारियों का बोझ इंसान को इस कदर ‘मशीन’ बना देता है कि वह अपने निजी दुखों को व्यक्त करना ही छोड़ देता है। वह शारीरिक थकान और मानसिक पीड़ा को सामान्य समझकर स्वीकार कर लेता है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसी स्थिति में इंसान अक्सर अपनी भूख तक भूल जाता है। कभी काम के दबाव में दोपहर का भोजन छूट जाता है तो कभी घर के बजट को संतुलित करने के लिए वह अपनी जरूरतों में कटौती कर देता है क्योंकि “पेट की आग जब परिवार के भविष्य की चिंता बन जाती है, तो इंसान को अपनी भूख का अहसास होना बंद हो जाता है।” अंततः, एक व्यक्ति का यह त्याग महान तो है, परंतु बहुत पीड़ादायक भी है। परिवार के अन्य सदस्यों का यह कर्तव्य है कि वे उस ‘स्तंभ’ की मौन चीखों को सुनें। हमें यह समझना होगा कि जो सबकी जरूरतों का ध्यान रख रहा है, उसे भी प्रेम, आराम और अपनी भूख मिटाने का हक है। एक खुशहाल परिवार वही है, जहाँ जिम्मेदारियों का बोझ केवल एक कंधे पर ना हो, बल्कि सब मिलकर खुशियां और दुख बांटें।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

