मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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दुनिया की चकाचौंध में हम अक्सर ‘ब्रांड’ और ‘स्तर’ के पीछे भागते हैं, लेकिन जीवन का अनुभव हमें सिखाता है कि चमक-धमक से ज्यादा महत्व स्थायित्व का है। जिस तरह एक महंगा लेकिन कच्चा रंग छोड़ने वाला कपड़ा अपनी उपयोगिता खो देता है, ठीक उसी तरह गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले लोग अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं। जब हम कोई ब्रांडेड कपड़ा खरीदते हैं, तो हमारी अपेक्षा होती है कि वह लंबे समय तक अपनी चमक बरकरार रखेगा। लेकिन अगर पहले ही धुलाई में उसका रंग उतर जाए, तो वह केवल एक बेकार चिथड़ा बन कर रह जाता है। ठीक यही स्थिति इंसानी रिश्तों की भी है। जो लोग ऊंचे पद, प्रतिष्ठा या ‘ब्रांडेड’ व्यक्तित्व का मुखौटा पहनकर मिलते हैं, लेकिन वक्त आने पर अपना असली (नकारात्मक) रंग दिखाने लगते हैं, वे अपनी गरिमा स्वयं ही समाप्त कर लेते हैं।
कपड़ा शरीर ढ़कता है, परंतु उसका रंग उतर जाए तो वह व्यक्तित्व को खराब करता है। इसी तरह चरित्र मन को ढ़़कता है, परंतु वह बदल जाए तो इंसान भरोसे के लायक नहीं रहता। अंततः, कीमत वस्तु की नहीं, उसकी गुणवत्ता और टिके रहने की क्षमता की होती है। जो कपड़ा रंग छोड़े, वह वार्डरोब से बाहर कर दिया जाता है और जो इंसान रंग बदले, उसे दिल से उतार दिया जाता है। सादगी और सच्चाई भले ही ‘ब्रांडेड’ ना दिखती हो, लेकिन ये वो पक्के रंग हैं, जो जीवन की हर आंधी और धुलाई के बाद भी फीके नहीं पड़ते। “कपड़ों का रंग उतरना तो फिर भी सह लिया जाता है, मगर अपनों का रंग बदलना रूह को सराबोर कर देता है।”
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

