Thursday, June 11, 2026
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अंधविश्वास और पुरानी रुढ़िवादी परंपराओं से बाहर निकलना ही समाज की प्रगति का है एकमात्र रास्ता

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव समाज की उन्नति का इतिहास गवाह है कि जब-जब मनुष्य ने अपनी सोच के दायरे को विस्तृत किया है, तब-तब सभ्यता ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। प्रगति केवल आर्थिक या तकनीकी विकास का नाम नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक परिवर्तन है। अंधविश्वास और सड़ी-गली परंपराओं की बेड़ियों को तोड़ना ही वास्तविक प्रगति की पहली शर्त है क्योंकि विकास में बाधक ​अंधविश्वास वह मिथ्या धारणा है जिसका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं होता। समाज में कई बार अंधविश्वास के नाम पर लोगों का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जाता है । चिकित्सा विज्ञान के बजाय झाड़-फूंक या टोने-टोटकों पर भरोसा करना आज भी कई मौतों का कारण बनता है।
हालांकि ​सभी परंपराएं गलत नहीं होती, लेकिन जो परंपराएं समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हैं और समाज के किसी वर्ग (जैसे महिलाओं या पिछड़ों) के अधिकारों का हनन करती हैं, वे रूढ़ियाँ बन जाती हैं। समय के साथ समाज की जरूरतें बदलती हैं। पुरानी कुप्रथाओं को ढ़ोते रहना समाज की गति को धीमा कर देता है। इसलिए ​जो परंपराएं मानव गरिमा और समानता के विरुद्ध हों, उन्हें त्याग देना ही विवेकपूर्ण है। जब हम पुरानी लकीरों को छोड़ते हैं, तभी नए विचारों और अविष्कारों के लिए जगह बनती है। ​अंधविश्वास और रूढ़िवादिता वह अंधकार है जो समाज को पीछे की ओर खींचता है। यदि हमें एक आधुनिक, सशक्त और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना है, तो हमें अपने मानसिक कपाट खोलने होंगे। पुरानी परंपराओं के कचरे को साफ करके ही हम विकास की नई इबारत लिख सकते हैं। अतः, विवेक और तर्क का दामन थामना ही सुनहरे भविष्य की एकमात्र गारंटी है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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