Friday, April 17, 2026
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वक्त गुजर जाता है, लेकिन उस वक्त में लिए गए गलत निर्णय और बोले गए शब्द दे जाते हैं स्थायी घाव

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर हम अपनी भावनाओं के बहाने बह जाते हैं और ऐसे कदम उठा लेता हैं जिनका पछतावा उम्र भर रहता है। हमारे जीवन के अधिकांश निर्णय हमारी मानसिक स्थिति से प्रभावित होते हैं, लेकिन समस्या तब आती है जब ‘भावनाएं’ हमारे ‘विवेक’ पर हावी हो जाती हैं। पुराने बुजुर्गों और मनोवैज्ञानिकों ने जीवन को संतुलित रखने के लिए तीन बुनियादी नियम बताए हैं । प्रथम नियम में ​अत्यधिक खुशी में वचन ना दें क्योंकि ​जब हम बहुत खुश होते हैं, तो हमारा मस्तिष्क ‘खुशी का हार्मोन’ के प्रभाव में होता है। उस समय हमें पूरी दुनिया हसीन लगती है और हम खुद को बहुत शक्तिशाली महसूस करते हैं। इसी उत्साह में हम अक्सर ऐसे वादे कर बैठते हैं जिन्हें निभाना भविष्य में असंभव या कठिन हो जाता है और जब खुशी का वह ज्वार उतरता है, तब हमें वास्तविकता का बोध होता है। वादा पूरा ना कर पाने पर ना केवल हमारी साख गिरती है, बल्कि रिश्तों में भी दरार आ जाती है। दूसरे नियम में ​क्रोध आने पर मौन रहें । ​क्रोध को ‘क्षणभंगुर पागलपन’ कहा गया है। गुस्से में इंसान की सोचने-समझने की शक्ति शून्य हो जाती है। उस समय जुबान से निकले शब्द कमान से निकले उस तीर की तरह होते हैं, जो वापस नहीं आ सकते। क्रोध के समय चुप रहना हारना नहीं, बल्कि जीतना है। मौन रहने से हम उन कड़वे शब्दों से बच जाते हैं जो वर्षों पुराने संबंधों को एक पल में राख कर सकते हैं।
तीसरे नियम में बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि दुख में कभी निर्णय ना लें क्योंकि
​दुख और निराशा के समय हमारे देखने का नजरिया नकारात्मक हो जाता है। उस समय हमें हर तरफ अंधेरा ही दिखाई देता है और हम अपनी क्षमताओं पर संदेह करने लगते हैं। ऐसे हालात में लिया गया कोई भी बड़ा फैसला (जैसे नौकरी छोड़ना, रिश्ता खत्म करना या कोई बड़ा बदलाव) अक्सर गलत साबित होता है। जिस प्रकार कोहरे में रास्ता साफ नहीं दिखता, वैसे ही दुख की स्थिति में सही विकल्प नहीं सूझते। ​जीवन एक समंदर की तरह है जिसमें भावनाओं की लहरें उठती-गिरती रहती हैं। एक सफल और शांत जीवन वही है, जहां नाव का पतवार ‘विवेक’ के हाथ में हो। खुशी, क्रोध और दुख—ये तीनों ही स्थितियां अस्थाई हैं। ​”वक्त गुजर जाता है, लेकिन उस वक्त में लिए गए गलत निर्णय और बोले गए शब्द स्थायी घाव दे जाते हैं।” ​इसलिए, अपनी भावनाओं को महसूस जरूर करें, लेकिन उन्हें अपना मालिक ना बनने दें। धैर्य और संयम ही वे दो स्तंभ हैं जिन पर एक सुखी जीवन की इमारत टिकी होती है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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