Thursday, June 11, 2026
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इंसान का पतन तब नहीं होता, जब वह असफल होता है, बल्कि तब होता है, जब वह अपनी पहचान खोकर किसी और का मुखौटा लेता है पहन

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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​जीवन के उतार-चढ़ाव में हम अक्सर ‘सफलता’ और ‘असफलता’ को ही उत्थान और पतन का पैमाना मान लेते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है। एक खिलाड़ी मैच हार सकता है, एक व्यवसायी का दिवालिया निकल सकता है या एक छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो सकता है—ये सभी घटनाएँ ‘असफलता’ हैं, ‘पतन’ नहीं। पतन एक आंतरिक प्रक्रिया है, जो तब शुरू होती है, जब हम खुद को स्वीकार करना बंद कर देते हैं। ​असफलता केवल एक पड़ाव है। यह हमें बताती है कि हमारी कोशिश में कहाँ कमी रह गई। महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन हजारों बार असफल हुए, लेकिन उन्होंने उसे पतन नहीं माना। पतन तब होता है, जब व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज को अनसुना कर देता है।
मुखौटा पहनकर हम दुनिया को तो खुश कर सकते हैं, लेकिन आईने में खुद से नजरें नहीं मिला पाते। यह आंतरिक संघर्ष ही वास्तविक पतन है।​सफलता का शिखर भी यदि किसी और का मुखौटा पहनकर हासिल किया जाए, तो वह व्यर्थ है। वहीं, अपनी पहचान के साथ खड़ी की गई असफलता भी गरिमामय है क्योंकि उसमें फिर से उठने की संभावना होती है। ​”पूरी दुनिया आपको वैसा बनाने में जुटी है, जैसे आप नहीं हैं, ऐसे में खुद बने रहना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।” ​अतः हारने से मत डरिए, बल्कि अपनी विशिष्टता खोने से डरिए। जिस दिन आप दूसरों की नकल छोड़़कर अपनी कमियों और खूबियों के साथ खुद को स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन आपका वास्तविक उत्थान शुरू होता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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