Friday, April 17, 2026
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“प्रगतिशील महाराष्ट्र या बाबाओं के दरबार में नतमस्तक सत्ता?”

“मेरे विचार, मेरी ताकत” इस श्रृंखला की शुरुआत करते समय एक स्पष्ट भूमिका तय की गई थी—विचारों से कोई समझौता नहीं होगा, सत्य को छिपाया नहीं जाएगा और समाज को अंधेरे में रखने वाली हर प्रवृत्ति से सीधे सवाल किए जाएंगे। क्योंकि महाराष्ट्र चुप रहने वालों का नहीं, बल्कि अन्याय की आंखों में आंखें डालकर जवाब देने वालों का प्रदेश है।

यही वह भूमि है जहां छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वाभिमान सिखाया, राजर्षि शाहू महाराज ने समानता का मार्ग दिखाया, महात्मा ज्योतिराव फुले ने अज्ञान के खिलाफ संघर्ष किया, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने तर्कशीलता का दीप प्रज्वलित किया और संत गाडगे महाराज ने अंधविश्वास पर प्रहार किया। लेकिन आज यही महाराष्ट्र एक कटु वास्तविकता का सामना कर रहा है, जहां विचारों की विरासत का दावा करने वाले ही अंधविश्वास के चरणों में नतमस्तक होते दिखाई दे रहे हैं।

नासिक जिले के अशोक खरात नामक तथाकथित ‘बाबा’ के इर्द-गिर्द बना यह जाल अब केवल आस्था का विषय नहीं रह गया है। यह सत्ता, प्रभाव और समाज को गलत दिशा में ले जाने वाली प्रवृत्तियों का प्रश्न बन चुका है। क्योंकि जब एक सामान्य व्यक्ति किसी बाबा के पास जाता है, तो वह उसका निजी विषय हो सकता है; लेकिन जब राज्य चलाने वाले, निर्णय लेने वाले और समाज को दिशा देने वाले नेता ऐसे दरबारों में उपस्थित होते हैं, तो वह एक सार्वजनिक प्रश्न बन जाता है।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रूपाली चाकणकर तथा अन्य कुछ प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे इस बाबा से जुड़े होने की चर्चाएं खुलकर सामने आ रही हैं। इन्हें केवल अफवाह कहकर खारिज करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि इससे समाज में एक खतरनाक संदेश जाता है कि सत्ता और अंधविश्वास का संबंध दिन-ब-दिन मजबूत होता जा रहा है।

इसी के साथ एक और गंभीर आरोप सामने आता है—मंत्री दीपक केसरकर द्वारा सड़क निर्माण के लिए लगभग तीन करोड़ रुपये की राशि दिए जाने की चर्चा। यदि यह सत्य है, तो यह केवल आस्था का विषय नहीं रह जाता; यह जनता के धन, प्राथमिकताओं और सत्ता के उपयोग का गंभीर प्रश्न बन जाता है।

एक ओर संविधान की शपथ लेने वाले नेता, और दूसरी ओर बाबाओं के चरणों में नतमस्तक होने की उनकी प्रवृत्ति—यह विरोधाभास महाराष्ट्र की प्रगतिशील पहचान पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। क्योंकि नेतृत्व केवल एक पद नहीं होता, वह एक आदर्श होता है। और जब आदर्श ही डगमगाने लगते हैं, तो समाज दिशाहीन हो जाता है।

अंधविश्वास केवल अज्ञान से पैदा नहीं होता, वह सत्ता के संरक्षण में पनपता है। और जब सत्ताधारी ही उसे बढ़ावा देते हैं, तो वह समाज की जड़ों को कमजोर कर देता है। आज आवश्यकता नाम उजागर करने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की है।

अंत में प्रश्न केवल इतना नहीं है कि किस नेता ने किस बाबा के चरणों में सिर झुकाया…
वास्तविक प्रश्न यह है कि जिन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के संविधान पर हाथ रखकर शपथ ली, वही यदि निर्णय लेने से पहले बाबाओं के दरबार में जा रहे हैं… तो क्या यह देश संविधान से चल रहा है या अंधविश्वास से?

यदि जनता का नेता ही बाबाओं के आशीर्वाद पर निर्भर है, तो आम नागरिक आखिर विज्ञान और शिक्षा पर विश्वास क्यों करे?

और यदि कल कोई निर्णय जनता के हित में नहीं, बल्कि “आशीर्वाद” लेकर लिया गया… तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

महाराष्ट्र को विचारों की विरासत देने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले, राजर्षि शाहू महाराज और संत गाडगे महाराज यदि आज होते, तो इस स्थिति को देखकर क्या कहते?

शायद वे भी यही प्रश्न पूछते—
“क्या यही प्रगति है… जहां सत्ता का मार्ग विज्ञान से नहीं, बल्कि अंधविश्वास के दरबार से होकर गुजरता है?”

और अब यह प्रश्न केवल नेताओं के सामने नहीं है…
यह प्रत्येक जागरूक नागरिक के सामने खड़ा है—

महाराष्ट्र विचारों से चलेगा… या बाबाओं के इशारों पर?

प्रकाश लांडगे, मुंबई,महाराष्ट्र

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