मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
फातिमा शेख एक भारतीय शिक्षिका थी, जो समाज सुधारक ज्योतिबा फुले और उनकी धर्मपत्नी शास्त्री बाई फुले की सहयोगी थी।
उनका जन्म 9 जनवरी 1831 में पुणे महाराष्ट्र भारत में हुआ था वह एक सामाजिक कार्यकर्ता थी जो शिक्षा का काम करती थी।
सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने भी शिक्षा पर काम किया था। फातिमा शेख ने दलित लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा पर काफी कुछ किया था उन्होंने समाज के अन्य और अत्याचार भी सह फिर भी वह डटकर खड़ी रही। इसीलिए शिक्षा के मार्ग पर जीत जब भी शास्त्री बाई फुले जी का नाम लिया जाएगा तो वहीं फातिमा से का नाम भी दोहराया जाएगा। पर यह बड़े ही दुख की बात है कि इतिहास में उनकी पहचान को दबा दिया गया है । जब भी सावित्री बाई स्कूल में नहीं होती थी या उनकी तबीयत खराब ।
होती थी तब फातिमा से की थी जो उनका पूरा कार्यभार संभालती थी। तो आईए जानते हैं आज उनके जन्मदिन पर उनकी जीवनी के बारे में।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि स्त्रियों या लड़कियों की शिक्षा पर शुरू से ही काफी चर्चा का विषय रहा है समाज ने शुरू से ही महिलाओं या लड़कियों की शिक्षा पर अपनी सहमति नहीं जताई है क्योंकि समाज को अच्छे से पता था कि अगर वह शिक्षित हो गई तो उनकी दकियानूसी बातों का विरोध करेंगी और अपने ठाकुर अधिकारों के लिए सजग हो जाएंगी। शिक्षा को लेकर कई आंदोलन चलाए गए हैं और कहीं ऐसी महिलाएं हैं जो सब शिक्षा और समाज सुधार के रूप में उभरकर सामने आई हैं जिन्होंने समाज सुधार और शिक्षा को ही अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया जिन्होंने समाज की कुरीतियों का डटकर सामना किया। ऐसी महिलाएं थी सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख। सावित्रीबाई फुले की मुख्य से होनी थी फातिमा शेख जिन्होंने उनका हर परिस्थिति में साथ दिया।
फातिमा शेख के भाई ज्योतिबा फुले के मित्र थे। ज्योतिबा फुले के पिता गोविंद राव ने जब समाज के दबाव में आकर अपने बेटे और बहू को घर से निकाल दिया था और अछूत लड़कियों को पटाने का काम बंद करने के लिए कहा था तो ज्योतिबा फुले जी ने उनके कहना मानने से इनकार कर दिया था उसे समय उस्मान शेख ने न केवल उनके रहने के लिए जगह दी थी बल्कि उनके लिए उनका स्कूल खोलने के लिए अपना घर भी दे दिया था। इस दौरान उस्मान शेख के घर में यह शिक्षा का काम शुरू हो गया था स्कूल में स्त्री और पुरुष दोनों साथ-साथ में पढ़ते थे। फातिमा शेख ने छतरी बाई फुले के साथ मिलकर अहमदाबाद में एक मिशनरी स्कूल टीचर की ट्रेनिंग ली थी। और उन दोनों ने फिर लोगों के बीच में जाकर शिक्षा की अलख जगाई थी। इस तरह से फातिमा शेख का ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के साथ ज्यादातर सहयोग रहा। 1856 में जब सावित्रीबाई फुले जी बीमार पड़ गई थी तो कुछ दिनों के लिए कार्यभार फातिमा शेख नहीं संभाला था और सावित्रीबाई फुले अपने घर चली गई थी वहीं से उनका पत्र लिखती थी। उन पत्रों के अनुसार फातिमा शेख ने पूरे स्कूल का कार्यभार अपने कंधों पर ले लिया था और वह स्कूल के प्रधानाचार्य भी बनी।
परंतु यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है की इतिहास में उनके संघर्ष के पन्नों को दबा दिया गया और उन्हें जो मुकाम हासिल होना था जो या जो उन्हें पहचान मिलनी थी वह मिल ना पाई और उनकी मृत्यु तिथि का भी कोई उचित प्रमाण नहीं है और ना ही उनकी जीवनी के बारे में भी क्योंकि किसी ने भी उनके जीवन के के संघर्ष को उजागर नहीं किया तो उनके जीवन के आधे अधूरे तथ्य ही प्राप्त हुए हैं ऐसा कहा जाता है कि अक्टूबर 1900 के आसपास उनकी मृत्यु हुई और इस तरह से हमने एक महान समाज सुधार का और शिक्षक को खो दिया। आज जो हमारे समाज में महिलाएं या बच्चा शिक्षा प्राप्त कर रही हैं या यूं कहीं की जो जीवन की रही है उनका मुख्य श्रेय उनका मुख्य श्रेय बाबासाहेब के साथ-साथ ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख जी को जाता है। हम आज भी उनके कर्जदार बने हुए हैं।
जय भीम जय संविधान नमो बुधाये
🙏🏻💙🌹
लेखक: नीलम सोनीपत
सामाजिक चिंतक जिला के ब्यूरो

