हर साल बुवाई के समय ही क्यों होती है खाद की किल्लत? किसानों ने लगाई उपेक्षा का आरोप, प्रशासन मौन
मूकनायक/प्रीति
उच्चैन (भरतपुर)। तहसील क्षेत्र में रबी और खरीफ फसल की बुवाई का समय आते ही एक बार फिर खाद-बीज की कालाबाजारी का पुराना खेल शुरू हो गया है। किसानों का आरोप है कि अधिकृत विक्रेता खाद की कृत्रिम कमी दिखाकर उसे ब्लैक में बेच रहे हैं, जिससे किसानों को मजबूरी में अधिक दाम चुकाना पड़ रहा है।
स्थानीय किसानों के अनुसार, अगर यह समस्या एक-दो बार होती तो इसे उत्पादन में कमी या आपूर्ति बाधा समझा जा सकता था, लेकिन हर साल बुवाई के सीजन में ही खाद गायब हो जाना, कई सवाल खड़े करता है।
सरकारी आंकड़े और जमीनी हकीकत में भारी अंतर
आपको बता दें कि प्रधानमंत्री भारतीय जन उर्वरक परियोजना के अंतर्गत भारत DAP की वास्तविक लागत 2989.30 रुपये है, जिस पर भारत सरकार द्वारा 1639.30 रुपये की सब्सिडी दी जाती है। इसके बाद किसान के लिए इसका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 1350 रुपये निर्धारित है।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसानों को 1350 रुपये में DAP मिल ही नहीं रही है। किसानों को मजबूरी में यही खाद 1800 से 2000 रुपये प्रति बोरी तक खरीदनी पड़ रही है।
सवाल यह है कि जब खाद बेचने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य है, फिर भी अंकित मूल्य से अधिक पर खाद कैसे बेची जा रही है? क्या खाद बेचने वाले अधिकृत व्यक्ति इतने प्रभावशाली हैं या फिर जानबूझकर किसानों की उपेक्षा की जा रही है?
किसानों ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से मांग की है कि क्षेत्र में खाद-बीज की दुकानों की सघन जांच कर कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और किसानों को निर्धारित मूल्य पर खाद उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए।

