मूकनायक /राष्ट्रीय प्रभारी डॉ ओमप्रकाश वर्मा
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सामाजिक दायरा और पारिवारिक पेड़ (फैमिली ट्री) हमें समाज में एक नाम, स्थान और पहचान तो दे सकते हैं, लेकिन वे केवल एक ढांचा मात्र हैं। एक मकान तब तक घर नहीं बनता जब तक उसमें रहने वालों के बीच आपसी प्रेम ना हो, ठीक उसी तरह कोई भी रिश्ता तब तक जीवंत नहीं होता, जब तक उसमें भावनाओं की गर्माहट और दिलों का जुड़ाव ना हो। बिना आत्मिक संबंध के, ये सामाजिक दायरे सिर्फ एक खोखली औपचारिकता और कागजी दस्तावेज बनकर रह जाते हैं। आज की आधुनिक और व्यस्त जीवनशैली में हम अक्सर ‘दिखावे के रिश्तों’ को संजोने में लगे रहते हैं। सोशल मीडिया पर सैकड़ों दोस्त होना या पारिवारिक समारोहों में रस्में निभाना एक सामाजिक जरूरत हो सकती है, लेकिन यदि संकट के समय सहानुभूति और मानसिक संबल देने वाला कोई न हो, तो वह भीड़ व्यर्थ है।
रिश्ते नाम से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख को महसूस करने, सम्मान देने और बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़े रहने से मजबूत होते हैं। सच्चा जुड़ाव वह है, जहाँ शब्दों से ज्यादा खामोशी समझी जाए। जब तक रिश्तों में भावनाओं का संचार नहीं होता, वे समय की धूप में सूख जाते हैं। इसलिए, हमें केवल पारिवारिक पेड़ों की शाखाएँ बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उनकी जड़ों में प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का पानी सींचने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि रिश्ते सिर्फ औपचारिक ना रहकर जीवन का वास्तविक आधार बनें। अगर हम अपने रिश्तों को जीवंत और मधुर बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें औपचारिकता से ऊपर उठकर दिलों को जोड़ना होगा। मन का सच्चा जुड़ाव ही रिश्तों की असली धरोहर है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

