मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍️✍️
जब बात आपके अधिकारों, प्रगति और सम्मान की हो, तो इतने दृढ़ बनिए कि दुनिया की कोई भी चालाकी आपकी आवाज को दबा ना सके। अपने लिए बोलना बेशर्मी नहीं, बल्कि सच्चा स्वाभिमान है। समाज में अक्सर यह सिखाया जाता है कि हमें हर परिस्थिति में शांत और संकोचशील रहना चाहिए, लेकिन जब बात हमारे मौलिक अधिकारों, आत्मसम्मान या मेहनत के हक की आती है तो यह शर्मीलापन हमारी कमजोरी बन जाता है। यहाँ ‘बेशर्म’ होने का अर्थ किसी की मर्यादा लांघना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति अटूट जिद और दृढ़ता दिखाना है। यह दुनिया उन चालाक और स्वार्थी तत्वों से भरी है, जो दूसरों के संकोच और शालीनता को उनकी लाचारी समझ लेते हैं।
जब कोई व्यक्ति अपने हक के लिए आवाज दबा लेता है या झिझक के कारण चुप रहता है, तो शोषक प्रवृत्ति के लोग उसका फायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं लगाते। इतिहास गवाह है कि अधिकारों की भीख नहीं मिलती, उन्हें छीनना पड़ता है या उनके लिए ़डटकर खड़ा होना पड़ता है। यदि हम अपने ही हक के लिए झिझकते रहेंगे, तो हमारे हिस्से का न्याय कोई दूसरा नहीं देगा। इसलिए, जरूरत पड़ने पर बेबाक और दृढ़ बनना जरूरी है। अपने न्यायसंगत अधिकारों के लिए जिद्दी बनना कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह आत्म-रक्षा और आत्म-सम्मान का सबसे प्रभावी तरीका है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

