Tuesday, September 29, 2026
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जशपुर में विश्व आदिवासी अधिकार दिवस पर कार्यक्रम आयोजित,आदिवासी अधिकार, संवैधानिक प्रावधान और सामाजिक मुद्दों पर वक्ताओं ने रखे विचार

मूकनायक

अंजय अनंत

जशपुर, 15 सितंबर। सर्व आदिवासी समाज के तत्वावधान में 13 सितंबर को जशपुर स्थित कम्युनिटी हॉल में विश्व आदिवासी अधिकार दिवस के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ समाज के बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, छात्र-छात्राएं, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हुए।
कार्यक्रम का संचालन सेवानिवृत्त प्राचार्य गोसनर टैप्पो ने किया तथा सभीनंद खलखो ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि से हुई। इस दौरान अतिथियों का शाल भेंटकर सम्मान किया गया।
रांची से पहुंचे सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी जगन्नाथ उरांव और सेवानिवृत्त जिला विकास अधिकारी पुनेउ उरांव सहित विभिन्न संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया और अपने विचार रखे।

////आदिवासी अधिकारों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा////

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लखन सुबोध, केंद्रीय संयोजक गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS), ने अपने संबोधन में आदिवासी अधिकारों के ऐतिहासिक आधार, वर्तमान स्थिति, संवैधानिक प्रावधानों, संगठनात्मक भूमिका और भविष्य की रणनीति से संबंधित विषयों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि आदिवासी अधिकारों का विषय केवल आरक्षण या सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार इसमें सामुदायिक पहचान, संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन, ग्राम सभा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे विषय भी शामिल हैं।
सुबोध ने धार्मिक स्वतंत्रता को संविधान में प्राप्त व्यक्तिगत अधिकार बताते हुए कहा कि व्यक्ति की धार्मिक पहचान और आदिवासी समुदाय की सामुदायिक पहचान को अलग-अलग संवैधानिक संदर्भों में समझा जाना चाहिए।
पांचवीं अनुसूची, PESA और वन अधिकार कानून का उल्लेख
संबोधन के दौरान पांचवीं अनुसूची, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी PESA तथा वन अधिकार अधिनियम (FRA) के प्रावधानों के क्रियान्वयन का मुद्दा भी उठाया गया।
सुबोध ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की भूमिका और सामुदायिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों को आदिवासी समाज के लिए महत्वपूर्ण बताया।

////डिलिस्टिंग के मुद्दे पर वक्ता ने रखी अपनी राय////

कार्यक्रम में डिलिस्टिंग के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। सुबोध ने धार्मिक पहचान के आधार पर आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर अपनी आशंका व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि इस विषय पर किसी भी प्रस्ताव अथवा मांग का मूल्यांकन उसके सामाजिक, संवैधानिक और कानूनी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। यह वक्ता की ओर से व्यक्त की गई राय थी।
विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय पर जोर
सुबोध ने आदिवासी समाज के विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय और साझा मुद्दों पर संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने आदिवासी, दलित, श्रमिक और अन्य वंचित समूहों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सामाजिक संवाद की बात कही।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकारों की जानकारी, कानूनी प्रावधानों के उपयोग, ग्राम सभाओं की भूमिका, संगठन निर्माण और जनजागरूकता के माध्यम से सामाजिक मुद्दों पर काम किया जा सकता है।
आगामी कार्यक्रमों की जानकारी
आयोजकों ने बताया कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिलों में जनजागरूकता, संवैधानिक अधिकारों और संगठनात्मक गतिविधियों से संबंधित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। आयोजकों के अनुसार, इसके लिए विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
कार्यक्रम में GSS के केंद्रीय संगठक एम.डी. सतनाम, कार्यालय सचिव अजय अनंत, प्रवक्ता वीरेंद्र भारद्वाज और मुंगेली जिला संयोजक रूपदास टंडन सहित अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
आयोजकों ने कार्यक्रम में हुई भागीदारी को आदिवासी अधिकारों से जुड़े विषयों पर चर्चा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।

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जशपुर में विश्व आदिवासी अधिकार दिवस पर कार्यक्रम आयोजित,आदिवासी अधिकार, संवैधानिक प्रावधान और सामाजिक मुद्दों पर वक्ताओं ने रखे विचार

मूकनायक

अंजय अनंत

जशपुर, 15 सितंबर। सर्व आदिवासी समाज के तत्वावधान में 13 सितंबर को जशपुर स्थित कम्युनिटी हॉल में विश्व आदिवासी अधिकार दिवस के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ समाज के बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, छात्र-छात्राएं, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हुए।
कार्यक्रम का संचालन सेवानिवृत्त प्राचार्य गोसनर टैप्पो ने किया तथा सभीनंद खलखो ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि से हुई। इस दौरान अतिथियों का शाल भेंटकर सम्मान किया गया।
रांची से पहुंचे सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी जगन्नाथ उरांव और सेवानिवृत्त जिला विकास अधिकारी पुनेउ उरांव सहित विभिन्न संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया और अपने विचार रखे।

////आदिवासी अधिकारों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा////

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लखन सुबोध, केंद्रीय संयोजक गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS), ने अपने संबोधन में आदिवासी अधिकारों के ऐतिहासिक आधार, वर्तमान स्थिति, संवैधानिक प्रावधानों, संगठनात्मक भूमिका और भविष्य की रणनीति से संबंधित विषयों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि आदिवासी अधिकारों का विषय केवल आरक्षण या सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार इसमें सामुदायिक पहचान, संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन, ग्राम सभा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे विषय भी शामिल हैं।
सुबोध ने धार्मिक स्वतंत्रता को संविधान में प्राप्त व्यक्तिगत अधिकार बताते हुए कहा कि व्यक्ति की धार्मिक पहचान और आदिवासी समुदाय की सामुदायिक पहचान को अलग-अलग संवैधानिक संदर्भों में समझा जाना चाहिए।
पांचवीं अनुसूची, PESA और वन अधिकार कानून का उल्लेख
संबोधन के दौरान पांचवीं अनुसूची, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी PESA तथा वन अधिकार अधिनियम (FRA) के प्रावधानों के क्रियान्वयन का मुद्दा भी उठाया गया।
सुबोध ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की भूमिका और सामुदायिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों को आदिवासी समाज के लिए महत्वपूर्ण बताया।

////डिलिस्टिंग के मुद्दे पर वक्ता ने रखी अपनी राय////

कार्यक्रम में डिलिस्टिंग के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। सुबोध ने धार्मिक पहचान के आधार पर आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर अपनी आशंका व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि इस विषय पर किसी भी प्रस्ताव अथवा मांग का मूल्यांकन उसके सामाजिक, संवैधानिक और कानूनी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। यह वक्ता की ओर से व्यक्त की गई राय थी।
विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय पर जोर
सुबोध ने आदिवासी समाज के विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय और साझा मुद्दों पर संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने आदिवासी, दलित, श्रमिक और अन्य वंचित समूहों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सामाजिक संवाद की बात कही।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकारों की जानकारी, कानूनी प्रावधानों के उपयोग, ग्राम सभाओं की भूमिका, संगठन निर्माण और जनजागरूकता के माध्यम से सामाजिक मुद्दों पर काम किया जा सकता है।
आगामी कार्यक्रमों की जानकारी
आयोजकों ने बताया कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिलों में जनजागरूकता, संवैधानिक अधिकारों और संगठनात्मक गतिविधियों से संबंधित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। आयोजकों के अनुसार, इसके लिए विभिन्न संगठनों के बीच समन्वय की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
कार्यक्रम में GSS के केंद्रीय संगठक एम.डी. सतनाम, कार्यालय सचिव अजय अनंत, प्रवक्ता वीरेंद्र भारद्वाज और मुंगेली जिला संयोजक रूपदास टंडन सहित अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
आयोजकों ने कार्यक्रम में हुई भागीदारी को आदिवासी अधिकारों से जुड़े विषयों पर चर्चा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।

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