मवेशियों को बचाने के चक्कर में ट्राला-पिकअप की भिड़ंत, बड़ा हादसा टला
मूकनायक
तनवीर शादाब
////बिलासपुर–रायपुर मुख्य मार्ग पर पाराघाट टोल प्लाजा के पास हादसा; सड़क पर सैकड़ों मवेशियों का जमावड़ा, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल////
बिलासपुर। बिलासपुर–रायपुर मुख्य मार्ग पर मस्तूरी थाना क्षेत्र अंतर्गत पाराघाट टोल प्लाजा के पास सड़क पर बैठे मवेशियों को बचाने के चक्कर में ट्राला और पिकअप वाहन की जोरदार भिड़ंत हो गई। हादसे में पिकअप चालक को मामूली चोटें आई हैं, जबकि ट्राला चालक के घटनास्थल से फरार होने की जानकारी सामने आई है। पुलिस द्वारा मामले की जांच करते हुए फरार चालक की तलाश की जा रही है। हादसे के बाद सामने आई तस्वीरें और वीडियो सड़क पर मौजूद मवेशियों की गंभीर समस्या को उजागर कर रहे हैं। पाराघाट टोल प्लाजा के आसपास तथा पूरे मार्ग पर बड़ी संख्या में मवेशी सड़क पर बैठे और खड़े दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है। इस मार्ग पर आए दिन आवारा एवं आसपास के गांवों के मवेशी सड़क पर आ जाते हैं। उन्हें बचाने के प्रयास में वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते हैं और कई बार बेजुबान पशु भी वाहनों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं।
“गौ रक्षक कहां हैं?”—बड़े-बड़े दावों से आगे बढ़कर अब बेजुबानों की हकीकत देखने का वक्त जब गौवंश की रक्षा और गौ सेवा की बात आती है तो बड़े-बड़े दावे और आवाजें सुनाई देती हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब सड़कों पर सैकड़ों-हजारों मवेशी खुलेआम बैठे रहते हैं और आए दिन दुर्घटनाओं में घायल या मौत का शिकार होते हैं, तब उनकी वास्तविक सुरक्षा के लिए आगे कौन आता है?
गौ रक्षा केवल नारों और दावों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अगर वास्तव में बेजुबानों की रक्षा करनी है, तो सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो रहे इन मवेशियों की सुरक्षा के लिए भी जमीन पर ठोस पहल जरूरी है।
यह किसी धर्म, समुदाय या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर जिंदगी और मौत का सवाल है। बात चाहे इंसान की जान की हो या किसी बेजुबान जानवर की—जान तो जान होती है।
एक ओर सड़क पर अचानक मवेशी आने से वाहन चालक और राहगीरों की जान खतरे में पड़ती है, वहीं दूसरी ओर इन्हीं मवेशियों को बचाने के प्रयास में दुर्घटनाएं होती हैं और बेजुबान पशु भी अपनी जान गंवा देते हैं।
////आखिर जिम्मेदार कौन—पशु मालिक या शासन-प्रशासन?////
यदि पशु मालिक अपने मवेशियों को खुले में छोड़कर सड़क तक पहुंचने देते हैं, तो उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं यदि लगातार शिकायतों और दुर्घटनाओं के बावजूद सड़क से मवेशियों को हटाने तथा उनकी आवाजाही रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था नहीं की जाती, तो शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
आम नागरिक आखिर किसे जिम्मेदार माने? उस वाहन चालक को, जिसके सामने अचानक सड़क पर मवेशी आ जाते हैं? उस पशु मालिक को, जो अपने मवेशियों को खुले में छोड़ देता है? या उस व्यवस्था को, जो समस्या की जानकारी होने के बावजूद उसका स्थायी समाधान नहीं कर पा रही है?
////शिकायतों के बावजूद समस्या जस की तस////
स्थानीय नागरिकों, समाजसेवियों और प्रतिदिन इस मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों द्वारा समय-समय पर शासन-प्रशासन का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर आकर्षित कराया गया है। मवेशियों के कारण होने वाली सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पशु मालिकों की जिम्मेदारी तय करने तथा दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान की बात भी सामने आती रही है।
इसके बावजूद जमीनी स्तर पर समस्या जस की तस बनी हुई है।
सैकड़ों मवेशियों का सड़क पर बैठे रहना केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मानव जीवन और पशुओं दोनों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।
सड़क पर मवेशी, हर पल मौत का खतरा विशेषकर रात के समय स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। तेज रफ्तार वाहनों के सामने अचानक मवेशी आ जाने पर चालक के पास वाहन नियंत्रित करने का पर्याप्त समय नहीं रहता। मवेशी को बचाने के प्रयास में वाहन दूसरे वाहन से टकरा सकता है, पलट सकता है या सड़क से नीचे जा सकता है। ऐसी घटनाओं में जहां इंसानी जान जोखिम में पड़ती है, वहीं कई बार बेजुबान पशु भी गंभीर रूप से घायल होकर या कुचलकर मर जाते हैं।
////पाराघाट टोल प्लाजा और सड़क की स्थिति पर भी सवाल////
स्थानीय लोगों ने पाराघाट टोल प्लाजा और आसपास की सड़क की स्थिति को लेकर भी नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि सड़क की स्थिति, यातायात व्यवस्था और सड़क पर मवेशियों के जमावड़े के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले हजारों वाहन चालक प्रतिदिन परेशानी और जोखिम का सामना कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मार्ग से प्रतिदिन आम नागरिकों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों, मंत्रीगण, प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों का भी आवागमन होता है, वहां सड़क पर सैकड़ों मवेशियों का जमावड़ा जिम्मेदारों को दिखाई क्यों नहीं देता?
////क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार है?////
आज एक दुर्घटना हुई, चालक को मामूली चोट आई और बड़ा हादसा टल गया। लेकिन हर बार किस्मत साथ दे, यह जरूरी नहीं।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अगली दुर्घटना किसी वाहन चालक, राहगीर या बेजुबान पशु की जान ले सकती है। स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों की मांग है कि सड़क पर मवेशियों की समस्या का स्थायी और प्रभावी समाधान किया जाए, पशु मालिकों की जिम्मेदारी तय की जाए, नियमानुसार कार्रवाई हो तथा दुर्घटना संभावित स्थानों पर विशेष निगरानी एवं सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। अब जरूरत सिर्फ बयान और दावों की नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई की है।
पाराघाट टोल प्लाजा के पास हुई यह दुर्घटना एक चेतावनी है।
////सवाल अब भी वही है—आखिर जिम्मेदार कौन और कार्रवाई कब?////
अगर आज भी इस गंभीर समस्या को नजरअंदाज किया गया, तो अगली दुर्घटना केवल एक खबर नहीं होगी, बल्कि किसी परिवार के लिए जिंदगी भर का दर्द बन सकती है।

