
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन और वन मंत्री केदार कश्यप के नेतृत्व में शुरू हुआ विशेष अध्ययन; जनजातीय ज्ञान, औषधीय पौधों और जैव विविधता का होगा वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण

रायपुर, 28 जुलाई। छत्तीसगढ़ की समृद्ध जैव विविधता, जनजातीय परंपराओं और औषधीय वनस्पतियों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण एवं वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण की दिशा में राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के दूरदर्शी मार्गदर्शन तथा वन मंत्री केदार कश्यप के नेतृत्व में वन विभाग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा ‘एथ्नोबॉटनी ऑफ छत्तीसगढ़’ (Ethnobotany of Chhattisgarh) नामक विशेष शोध परियोजना प्रारंभ की गई है। इस परियोजना का उद्देश्य स्थानीय समुदायों के पास पीढ़ियों से संरक्षित औषधीय एवं उपयोगी पौधों से संबंधित पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हुए उसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और संरक्षण करना है।

स्थानीय ज्ञान को मिलेगा वैज्ञानिक आधार
शोध परियोजना के माध्यम से जनजातीय एवं ग्रामीण समुदायों द्वारा औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों तथा अन्य उपयोगी वनस्पतियों के पारंपरिक उपयोग का अध्ययन किया जाएगा। विशेषज्ञ इन जानकारियों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर उन्हें भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित करेंगे। इससे न केवल स्थानीय ज्ञान को नई पहचान मिलेगी, बल्कि जैव विविधता संरक्षण, पारंपरिक चिकित्सा पद्धति और वन संसाधनों के सतत उपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।

बस्तर संभाग से हुई शोध कार्य की शुरुआत
परियोजना के प्रथम चरण की शुरुआत बस्तर संभाग से की गई है। अध्ययन के लिए टी.डी.यू. बेंगलुरु के एमेरिटस प्रोफेसर डॉ. के. रवि कुमार, प्रोफेसर डॉ. अब्दुल करीम तथा जनजातीय औषधि विशेषज्ञ डॉ. देवयानी शर्मा सहित विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम ने क्षेत्र का विस्तृत भ्रमण किया।
वैज्ञानिकों ने बीजापुर जिले के भोपालपटनम, उसूर, भैरमगढ़ और बीजापुर सहित अनेक क्षेत्रों का दौरा कर स्थानीय पारंपरिक वैद्यों, ग्रामीणों और जनजातीय समुदायों से संवाद किया। इस दौरान औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और उनके पारंपरिक उपयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्र की गईं। पौधों की सही पहचान और उनके प्राकृतिक स्वरूप को समझने के लिए विशेषज्ञों ने स्थानीय वैद्यों के साथ जंगलों का भी भ्रमण किया।
जीवन, संस्कृति और परंपराओं में वनस्पतियों की भूमिका का अध्ययन
शोध दल केवल औषधीय पौधों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदायों के दैनिक जीवन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक आयोजनों, लोक मान्यताओं और पारंपरिक त्योहारों में पेड़-पौधों की भूमिका का भी विस्तृत अध्ययन कर रहा है। साथ ही यह भी समझने का प्रयास किया जा रहा है कि वनस्पतियां ग्रामीणों और जनजातीय समुदायों की आजीविका, पारंपरिक अर्थव्यवस्था और जीवनशैली में किस प्रकार महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
बस्तर के बाद अन्य जिलों में भी पहुंची वैज्ञानिकों की टीम
बीजापुर में अध्ययन के बाद शोध दल ने दंतेवाड़ा, बस्तर, कोण्डागांव और कांकेर जिलों का भी भ्रमण किया। इन क्षेत्रों में पारंपरिक वैद्यों, वनवासियों और ग्रामीणों से संवाद कर स्थानीय ज्ञान, अनुभव तथा वनस्पतियों के उपयोग से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियों का संग्रह किया गया। विशेषज्ञों ने विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध जैव विविधता का भी अध्ययन किया, ताकि पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संबंध को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
पूरे प्रदेश में होगा अध्ययन का विस्तार
शोध परियोजना के प्रथम चरण में बस्तर संभाग से महत्वपूर्ण प्रारंभिक आंकड़े और जानकारियां एकत्र की गई हैं। आगामी चरणों में इस अध्ययन का विस्तार राज्य के सभी संभागों और जिलों तक किया जाएगा। इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ की जैव विविधता, पारंपरिक औषधीय ज्ञान और स्थानीय वनस्पतियों का व्यापक एवं व्यवस्थित दस्तावेज तैयार किया जाएगा, जिससे संरक्षण और अनुसंधान दोनों को नई दिशा मिलेगी।
भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित होगी अमूल्य विरासत
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिकता के दौर में जनजातीय समाज का पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्त होने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में यह शोध परियोजना न केवल इस ज्ञान को संरक्षित करेगी, बल्कि वैज्ञानिक समुदाय और समाज के बीच पारंपरिक ज्ञान की उपयोगिता को भी स्थापित करेगी। इससे जैव विविधता संरक्षण को मजबूती मिलेगी, औषधीय वनस्पतियों पर शोध को प्रोत्साहन मिलेगा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए छत्तीसगढ़ की यह अमूल्य प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सकेगी।

