मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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बहुमत के साथ सहमत होना या भीड़ का हिस्सा होना हमेशा सही होने की गारंटी नहीं है, क्योंकि सत्य का संबंध संख्या बल से नहीं बल्कि तथ्यों और विवेक से होता है। इतिहास गवाह है कि कई बार पूरी दुनिया एक तरफ थी और सच कहने वाला व्यक्ति अकेला था। जब गैलीलियो ने कहा था कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है, तब पूरा समाज उनके खिलाफ था, लेकिन अंत में गैलीलियो ही सही साबित हुए। भीड़ के साथ चलने के पीछे अक्सर ‘भेड़चाल’ की मानसिकता काम करती है। लोग सामाजिक बहिष्कार के डर से या दूसरों को सही मानकर अपनी सोचने-समझने की क्षमता खो देते हैं। जहाँ व्यक्ति खुद का आकलन करने के बजाय सामूहिक निर्णय के आगे आत्मसमर्पण कर देता है।
भीड़ अक्सर भावनाओं, अफवाहों और तात्कालिक आक्रोश से संचालित होती है, जबकि सत्य को खोजने के लिए धैर्य, तर्क और निष्पक्ष विश्लेषण की आवश्यकता होती है। यदि कोई गलत बात लाखों लोग भी मिलकर कह रहे हों, तो भी वह सच नहीं हो जाती। इसके विपरीत, यदि कोई सच केवल एक व्यक्ति भी बोल रहा है, तो उसकी प्रमाणिकता कम नहीं होती। एक जागरूक समाज के लिए यह जरूरी है कि हम किसी भी विचार को सिर्फ इसलिए स्वीकार ना करें क्योंकि उसे मानने वालों की संख्या अधिक है। हमें अपनी तार्किक क्षमता का उपयोग करना चाहिए और भीड़ का अंधानुकरण करने के बजाय सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाना चाहिए।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

