मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आमतौर पर समाज में सुंदरता का पैमाना गोरे रंग, तीखे नैन-नक्श और शारीरिक बनावट को मान लिया जाता है, लेकिन वास्तव में, सौंदर्य कोई वस्तु या स्थिर परिभाषा नहीं है । यह तो देखने वाले की दृष्टि और उसके दिल की भावना पर निर्भर करता है। जब हम किसी से प्रेम, सम्मान या आत्मीयता का जुड़ाव महसूस करते हैं, तो वह हमें स्वतः ही सुंदर लगने लगता है। एक माँ को अपना बच्चा हमेशा दुनिया में सबसे सुंदर दिखाई देता है, चाहे उसका रंग-रूप कैसा भी हो। यहाँ आँखें नहीं, बल्कि दिल पसंद करता है। जब हम किसी के अच्छे स्वभाव और नेक दिल से प्रभावित होते हैं, तो हमारी आँखें स्वतः ही उसे सुंदर मानने लगती हैं।
वास्तविक सुंदरता व्यक्ति के व्यवहार, उसके विचारों और चरित्र में निहित होती है। बाहरी सुंदरता समय के साथ ढ़ल जाती है, लेकिन व्यवहार की मधुरता, मन की पवित्रता और स्वभाव की सादगी कभी फीकी नहीं पड़ती। जब आँखें किसी के इन आंतरिक गुणों को देख लेती हैं, तो वह इंसान हमेशा के लिए सुंदर हो जाता है। अंततः, सुंदरता का निवास किसी के चेहरे पर नहीं, बल्कि देखने वाले की ‘नज़र’ में होता है। यदि हमारी आँखों में सकारात्मकता, प्रेम और सहानुभूति है, तो हमें हर उस चीज़ में सौंदर्य नजर आएगा जो प्रामाणिक और सच्ची है। इसलिए, सुंदर दिखने के बजाए अपनी दृष्टि और विचारों को सुंदर बनाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

