Tuesday, September 29, 2026
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शिक्षा का अधिकार और उम्मीदों का संघर्ष: डोर-टू-डोर सर्वे में सामने आई ग्रामीण शिक्षा की जमीनी हकीकत

बम्हनीडीह। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और मानवीय चुनौतियों से जुड़ा एक व्यापक विषय है। शासकीय नवीन प्राथमिक शाला रोहदी के शिक्षक गुलज़ार बरेठ द्वारा डोर-टू-डोर सर्वे अभियान के दौरान किए गए अनुभवों ने ग्रामीण शिक्षा की वास्तविक तस्वीर को सामने रखा है। उनका कहना है कि एक ओर कुछ बच्चों के स्कूल से जुड़ने की खुशी है, तो दूसरी ओर आजीविका की तलाश में परिवारों के पलायन के कारण शिक्षा से दूर हो रहे बच्चों की चिंता भी उतनी ही गंभीर है।

गुलज़ार बरेठ ने बताया कि सर्वे के दौरान एक ऐसे बच्चे का स्कूल में प्रवेश कराया गया, जिसकी आंखों में पढ़ाई और बेहतर भविष्य का उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। वहीं कई ऐसे परिवार भी मिले, जो रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन कर चुके हैं। ऐसे में उनके बच्चों की शिक्षा बीच में ही छूट जाती है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति अभिभावकों की शिक्षा के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी का परिणाम है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षित देखना चाहते हैं, लेकिन सीमित आय और रोजमर्रा की जरूरतों के कारण कई बार उन्हें बच्चों की पढ़ाई से अधिक परिवार के भरण-पोषण को प्राथमिकता देनी पड़ती है। ऐसे परिवारों के लिए शिक्षा और आजीविका के बीच संतुलन बनाना बेहद कठिन हो जाता है।

गुलज़ार बरेठ के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षक की भूमिका केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहती। शिक्षक को सामाजिक कार्यकर्ता, मार्गदर्शक और अभिभावकों के विश्वासपात्र के रूप में भी कार्य करना पड़ता है। घर-घर जाकर बच्चों का सर्वे करना, अभिभावकों को शिक्षा के महत्व से अवगत कराना और विद्यालय से जोड़ने का प्रयास करना शिक्षक की सामाजिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उन्होंने सरकारी और निजी विद्यालयों के बीच मौजूद संसाधनों के अंतर की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उनका कहना है कि निजी विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों को आधुनिक सुविधाएं, डिजिटल संसाधन और अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग सहज उपलब्ध हो जाता है, जबकि अनेक सरकारी विद्यालयों के बच्चों के पास कभी-कभी आवश्यक अध्ययन सामग्री और घर पर पढ़ाई के लिए अनुकूल वातावरण तक उपलब्ध नहीं होता। इसके बावजूद ग्रामीण बच्चों में प्रतिभा और सीखने की जिज्ञासा किसी भी प्रकार से कम नहीं होती।

उन्होंने कहा कि आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों में आत्मविश्वास विकसित किया जाए और उन्हें ऐसे अवसर प्रदान किए जाएं, जिससे वे भी जीवन के हर क्षेत्र में समान रूप से प्रतिस्पर्धा कर सकें। एक बच्चे को विद्यालय से जोड़ना केवल उसके जीवन में बदलाव लाना नहीं, बल्कि पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को नई दिशा देना है।

लेख के अंत में गुलज़ार बरेठ ने कहा कि शिक्षा केवल साक्षरता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और बेहतर भविष्य की आधारशिला है। उन्होंने सभी अभिभावकों से अपने बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजने का आग्रह करते हुए कहा कि बच्चों को श्रम का साधन नहीं, बल्कि देश के भविष्य के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि समाज, अभिभावकों और शिक्षकों के संयुक्त प्रयासों से प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा का अधिकार प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है।

लेखक: गुलज़ार बरेठ
शासकीय नवीन प्राथमिक शाला, रोहदी
विकासखंड – बम्हनीडीह, जिला जांजगीर चांपा

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