मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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प्रकृति का यह नियम है कि अति हर चीज़ को नष्ट कर देती है। जब हम किसी पौधे को उसकी क्षमता से अधिक पानी देते हैं, तो उसकी जड़ें सांस नहीं ले पातीं और धीरे-धीरे सड़ने लगती हैं। ठीक यही नियम इंसानी रिश्तों पर भी लागू होता है। जब किसी रिश्ते में एक तरफ से ज़रूरत से ज़्यादा झुकाव, सक्षमता से अधिक महत्व या अति-अपेक्षाएं होने लगती हैं, तो वह प्यार का सिंचन नहीं, बल्कि घुटन बन जाता है। जैसे जड़ों को फैलने के लिए सूखी मिट्टी और हवा की ज़रूरत होती है, वैसे ही हर व्यक्ति को रिश्ते में रहते हुए भी अपनी व्यक्तिगत पहचान और स्पेस की आवश्यकता होती है। जब हम किसी को अपनी क्षमता से अधिक केंद्र में रख लेते हैं, तो हम अनजाने में उनके निजी दायरे को छोटा करने लगते हैं।
मनोविज्ञान कहता है कि जो चीज़ बिना मांगे और असीमित मात्रा में मिलती है, उसका मूल्य कम होने लगता है। जब आप अपनी सक्षमता से बढ़कर किसी को समय, भावनाएं या महत्व देते हैं, तो सामने वाला उसे ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (सहज उपलब्ध) मान लेता है। जब आप किसी को अपनी क्षमता से अधिक महत्व देते हैं, तो अवचेतन मन में एक भारी उम्मीद भी जन्म लेती है कि सामने वाला भी वैसा ही करे। जब दूसरा व्यक्ति उस स्तर पर आकर प्रतिक्रिया नहीं दे पाता, तो निराशा, कड़वाहट और अंततः अलगाव का जन्म होता है । प्रेम और परवाह का मतलब खुद को मिटा देना या सामने वाले को बांध देना नहीं है। एक स्वस्थ रिश्ते की नींव ‘संतुलन’ पर टिकी होती है। पौधे को उतना ही पानी दीजिए जितना वह सोख सके, और रिश्तों को उतना ही महत्व दीजिए जिससे दोनों का आत्मसम्मान और स्वतंत्रता बची रहे।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

