मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर स्वार्थ और परिस्थितियां इंसान को बदल देती हैं। जो व्यक्ति कल तक आपके सुख-दुख का साथी था, वह आज आपकी परछाई से भी दूर भागने लगता है। यही वह क्षण होता है, जब इंसान को समझ आता है कि ‘अपनापन’ सिर्फ एक मानसिक भ्रम या वहम था क्योंकि समय के साथ लोगों की प्राथमिकताएं, रुचियां और जरूरतें बदल जाती हैं। जब तक स्वार्थ या हित आपस में जुड़े होते हैं, तब तक रिश्ता गहरा दिखता है। जैसे ही स्थितियां बदलती हैं, लोग नए रास्ते चुन लेते हैं। बचपन के गहरे दोस्त, जवानी के साथी और कभी-कभी खून के रिश्ते भी वक्त की आंधी में इस कदर दूर हो जाते हैं कि वे ‘गैर’ से भी बढ़कर अजनबी लगने लगते हैं।
यह भी सत्य है कि मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेला ही जाता है। बीच के सफर में जो लोग मिलते हैं, वे सहयात्री मात्र होते हैं। हम अनजाने में उन्हें अपना मानकर जीवन भर के लिए उनके साथ की उम्मीद कर बैठते हैं। जब बुढ़ापे या विपत्ति के समय वे साथ छोड़ देते हैं, तब यह कड़वी हकीकत सामने आती है कि हर व्यक्ति अंततः अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। यह हमें सिखाता है कि खुद से ज्यादा उम्मीद किसी और से नहीं रखनी चाहिए । अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि रिश्तों में ‘स्थायित्व’ की उम्मीद करना एक सुंदर वहम है। वक्त की मार और इंसानी फितरत किसी को भी पल भर में गैर बना सकती है। इसलिए, जीवन का असली आनंद इस बात में है कि हम जब तक जिनके साथ हैं, तब तक बिना किसी शर्त और बिना किसी बड़ी उम्मीद के प्रेमपूर्वक जिएं। दूसरों को अपना बनाने की जिद छोड़ने के बाद ही इंसान खुद को पहचान पाता है, और यही जीवन का सबसे बड़ा सच है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

