Thursday, June 11, 2026
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परिवार, समाज और किसी भी रिश्ते को निभाने की कला में तालमेल और समझौता ही हैं दो सबसे बड़े स्तंभ

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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हमारे बड़े-बुजुर्ग हमेशा एक बात कहते हैं कि परिवार, समाज और किसी भी रिश्ते को निभाना एक कला है और इस कला के दो सबसे बड़े स्तंभ तालमेल और समझौता हैं, लेकिन लोग इन दोनों के बीच का अंतर भूल जाते हैं। अनुभवी बुजुर्गों का कहना है कि इंसान को तालमेल वहाँ रखना चाहिए, जहाँ सामने वाला आपके साथ दिल से रहना चाहता हो। वहाँ दोनों तरफ से प्रयासों की ज़रूरत होती है और समझौता वहाँ करें, जहाँ आप खुद किसी के साथ रहना चाहते हों क्योंकि किसी बेहद प्यारे रिश्ते को बचाने के लिए थोड़ा झुक जाना बुरा नहीं होता।
जीवन की मुट्ठी भर राख होने और खाली हाथ जाने की हकीकत जानने के बावजूद रिश्तों के इस ताने-बाने के बीच, इंसान अक्सर अहंकार और धन-दौलत के पीछे अंधा हो जाता है। ऐसे में जीवन की अंतिम सच्चाई को बयां करती ये पंक्तियाँ हर किसी को झकझोर देती हैं और रह जाती है दौलत हाथ में,
और इंसान मिल जाता है खाक में! सोच कर तो देख ऐ बंदे, आखिर क्या है तेरे हाथ में? इन तथ्यों से स्वत: स्पष्ट है कि यह ज़िंदगी बेहद छोटी है। जब अंत में कुछ भी साथ नहीं जाना है, तो अहंकार कैसा? इसलिए आज ही अपने रिश्तों को समय दें क्योंकि इंसान चले जाते हैं और पीछे सिर्फ यादें और पछतावा रह जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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