मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन की ढ़लती शाम एक महान शिक्षक की तरह होती है, जो सच और झूठ का पर्दा हटा देती है। जिस ‘उच्च पद’ के रसूख व अहंकार में जो इंसान कभी जमीन पर पैर नहीं रखता था, वह रिटायरमेंट की धूल में खो जाता है। जिस ‘बैंक बैलेंस’ की तिजोरी को भरने के लिए अपनों को पीछे छोड़ दिया था, वह महज कुछ बेजान आंकड़े बनकर रह जाता है और वह ‘अहंकार’, जिसने कभी किसी के आगे झुकना नहीं सिखाया, अंतिम समय की लाचारी के आगे खुद ब खुद घुटने टेक देता है। जीवन के उस आखिरी मोड़ पर ना तो आपकी कुर्सी काम आती है, ना दौलत और ना ही आपका घमंड काम आता है। अगर कुछ साथ चलता है, तो वो हैं—खूबसूरत यादें और निस्वार्थ रिश्ते। जब दौड़ने भागने की उम्र निकल जाती है, तब इंसान अपनी उपलब्धियों की फाइलें नहीं खोलता, बल्कि यादों की एल्बम खंगालता है। अपनों के साथ बिताए गए वो बेफिक्र लम्हे, किसी रोते हुए को हंसाने का वो संतोष और बिना किसी स्वार्थ के बांटी गई समाज सेवा की खुशियों की वो अनमोल यादें हैं, जो अंतिम समय में इंसान के चेहरे पर एक सच्ची और आत्मिक मुस्कान लाती हैं।
यह एक शाश्वत सत्य है कि सिकंदर भी जब दुनिया से गया, तो उसके हाथ खाली थे। अहंकार और संपत्ति यहीं धरे रह जाते हैं । विदा होते इंसान के साथ केवल वही दुआएं और प्यार जाता है जो उसने जीते जी दूसरों के दिलों में कमाया था। पद, पैसा और तरक्की केवल जीवन को चलाने के साधन हैं, इन्हें जीवन का साध्य मत बनने दीजिए। अहंकार को छोड़कर विनम्र बनिए, क्योंकि झुकता वही है जिसमें जान होती है, अकड़ तो मुर्दे की पहचान होती है। आज से ही अपने काम के साथ-साथ अपने रिश्तों को सींचना शुरू कीजिए क्योंकि जब इस सफर का अंत होगा, तब आपकी तिजोरी का वजन नहीं, बल्कि आपके जाने पर अपनों की आंखों से बहने वाले आंसुओं की नमी ही आपकी असली कमाई होगी।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

