मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव स्वभाव की एक कड़वी सच्चाई है कि इंसान जब तक सुरक्षित और संपन्न रहता है, वह अपनी बनाई हुई काल्पनिक सीमाओं “धर्म, जाति, ऊंच-नीच और अहंकार” के नशे में चूर रहता है, लेकिन समय का चक्र जब घूमता है और परिस्थितियां विपरीत होती हैं, तो यह सारा नशा कपूर की तरह उड़ जाता है। कहते हैं कि इंसान का धर्म और जाति का नशा उस वक्त उतर जाता है, जब अस्पताल में खून की और कोर्ट में जमानती की जरूरत होती है। जब कोई अपना जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है और डॉक्टर कहता है कि “तुरंत ओ-नेगेटिव (O-) खून का इंतजाम करिए, वरना इन्हें बचाया नहीं जा सकता,” तब इंसान की सारी कट्टरता दम तोड़ देती है।उस वक्त कोई यह नहीं पूछता कि डोनर हिंदू है या मुसलमान, सवर्ण है या दलित। उस संकट की घड़ी में सिर्फ ‘इंसान’ और उसका ‘खून’ मायने रखता है। जिस जाति को इंसान ताउम्र अपने से छोटा समझता रहा, अगर उसी जाति के किसी व्यक्ति का खून उसके अपनों की रगों में दौड़कर उन्हें नवजीवन देता है, तो जातिवाद का वह खोखला नशा पल भर में उतर जाता है।
ठीक इसी तरह, जब कानून का शिकंजा कसता है और व्यक्ति कोर्ट-कचहरी के चक्करों में फंसकर जेल की सलाखों के पीछे जाने की कगार पर होता है, तब उसे अपनी असली हैसियत का अंदाजा होता है। उस वक्त जो व्यक्ति अपनी जमीन, अपने दस्तावेज लेकर अदालत में खड़ा होता है और कहता है कि “मैं इसकी जमानत लेता हूँ,” वही उसका सबसे बड़ा मसीहा होता है। वह जमानती किसी भी मजहब या बिरादरी का हो सकता है। संकट में साथ देने वाला वह इंसान ही उसका सबसे बड़ा सगा बन जाता है।
अक्सर देखा गया है कि जिन धर्म और जाति के ‘ठेकेदारों’ के नाम पर लोग समाज में लड़ते भिड़ते हैं, मुसीबत आने पर वे सबसे पहले पल्ला झाड़ लेते हैं। इससे हमें यह सीख मिलती है कि संकट ही सबसे बड़ा शिक्षक है और कुदरत जब भी चोट करती है, वह इंसान के बनाए हर कृत्रिम विभाजन को ध्वस्त कर देती है। अस्पताल का बेड और अदालत का कटघरा—ये दो ऐसी जगहें हैं जहाँ इंसान का ‘स्टेटस’, उसका ‘मजहब’ और उसकी ‘जाति’ शून्य हो जाते हैं। वहाँ सिर्फ दो ही चीजें बचती हैं, मजबूरी और इंसानियत। यह विचार हमें झकझोरता है और सीख देता है कि जब अंत में हमें एक-दूसरे के ही काम आना है, तो फिर इस स्वस्थ जीवन में धर्म और जाति के नाम पर नफरत का नशा क्यों पालना? असली धर्म तो ‘इंसानियत’ है, जो अस्पताल की ड्रिप में और अदालत की गवाही में साफ-साफ नजर आती है। समय रहते इस नशे से जाग जाना ही समझदारी है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

