Thursday, June 11, 2026
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उठो ओबीसीयों, सोच को बदलो — सितारे बदल जाएंगे,नज़र को बदलो — नज़ारे बदल जाएंगे।

देश में चल रही जनगणना में 60% आबादी वाले ओबीसी समाज की जातिनिहाय जनगणना नहीं किया जाना केवल एक साधारण नजरअंदाजी नहीं, बल्कि वर्तमान सरकार की एक सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है। इसलिए देश के ओबीसी समाज को अपने संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई के लिए एकजुट होना आने वाले भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक कदम होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जातिनिहाय आंतरिक मतभेदों को भुलाकर एकता का परिचय दें। यही एकजुटता संविधान के संरक्षण और हमारे अधिकारों की सुरक्षा का मजबूत आधार बन सकती है। इस संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई में बहुजन समाज के सभी साथियों को भी साथ लेकर चलना समय की मांग है।

जिस प्रकार संविधान निर्माण के समय परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी ने जाति, धर्म और पंथ से ऊपर उठकर सर्वसमावेशक धाराओं को संविधान में समाहित किया, उसी कारण आज भारत का संविधान विश्व के श्रेष्ठ संविधानों में गिना जाता है। इसी वजह से देश के सभी जाति, धर्म और पंथ के लोगों को अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की उम्मीद रहती है।

बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था —“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसका परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि उसे चलाने वाले शासक कितने अच्छे हैं।”

आज भारत में चल रही जनगणना में 60% आबादी वाले ओबीसी समाज को नजरअंदाज करना वर्तमान शासकों की मानसिकता को दर्शाता है। यह विषय भले प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत कार्यरत हो, लेकिन इसका उत्तर राजनीतिक स्तर पर दिया जाएगा।

इस सामाजिक दायित्व के कार्य में सहयोग देने वाले मीडिया प्रतिनिधियों, वाचकगण एवं सभी समाज बंधुओं का अखिल भारतीय ओबीसी बहुजन महासंघ हृदय से आभार व्यक्त करता है।

🖋️ डॉ. खुशाल बोपचे अध्यक्ष, अखिल भारतीय ओबीसी बहुजन महासंघपूर्व विधायक एवं पूर्व सांसद, भंडारा लोकसभा, महाराष्ट्र

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