ग्राम छायन में शोकसभा के माध्यम से ग्यारहवीं-तेरहवीं जैसी परंपराओं पर उठे सवाल
विजयराम आजाद
उप सम्पादक, मूकनायक
ललितपुर/उत्तर प्रदेश। महरौनी तहसील के ग्राम छायन में पंचायत राज विभाग से जुड़े रामप्रसाद के निधन के पांचवें दिन पारंपरिक तेरहवीं और ग्यारहवीं जैसी रस्मों के स्थान पर एक सादगीपूर्ण शोकसभा आयोजित की गई। कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं और सामाजिक लोगों ने वर्षों से चली आ रही कुप्रथाओं से दूर रहने का संदेश देते हुए समाज को जागरूक करने का प्रयास किया।
शोकसभा में पहुंचे भंते जी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि समाज को ऐसी परंपराओं और कुरीतियों से दूर रहने की आवश्यकता है, जो परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालती हैं। उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद दिखावे और भोज के बजाय परिवार को मानसिक और सामाजिक सहयोग देना अधिक आवश्यक है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने ग्यारहवीं और तेरहवीं जैसी परंपराओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी चर्चा की। वक्ताओं के अनुसार पुराने समय में संचार और यातायात के साधनों का अभाव था। किसी व्यक्ति के निधन की सूचना दूर-दराज के रिश्तेदारों और परिचितों तक पहुंचने में कई दिन या महीने लग जाते थे। लोग पैदल या बैलगाड़ियों से यात्रा कर शोक प्रकट करने पहुंचते थे, जिसके कारण उन्हें रात्रि विश्राम और भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती थी। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए समाज में ग्यारहवीं और तेरहवीं जैसी परंपराएं विकसित हुई थीं, ताकि एक निश्चित दिन सभी लोग एकत्र हो सकें।
विजयराम आजाद ने कहा कि वर्तमान समय में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और आधुनिक परिवहन साधनों के कारण किसी भी व्यक्ति के निधन की सूचना कुछ ही मिनटों में दूर-दूर तक पहुंच जाती है। अंतिम संस्कार में ही अधिकांश लोग शामिल हो जाते हैं। ऐसे में आज के समय में तेरहवीं और ग्यारहवीं जैसी रस्में परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बन चुकी हैं। उन्होंने कहा कि कई परिवार सामाजिक दबाव के कारण कर्ज लेकर भोज और रस्में करते हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और भविष्य प्रभावित होता है।
सभा में वक्ताओं ने यह भी कहा कि रिश्तेदार और साहूकार तेरहवीं के आयोजन के लिए ऊंचे ब्याज पर पैसे दे देते हैं, लेकिन किसी गरीब परिवार के बच्चे की शिक्षा के लिए मदद करने को तैयार नहीं होते। इसे समाज की विडंबना बताते हुए लोगों ने ऐसी कुप्रथाओं को समाप्त करने की आवश्यकता बताई।
बहुजन समाज पार्टी के नेता चंद्रभान बेसरा ने अपने संबोधन में कहा कि तथागत गौतम बुद्ध, संत रविदास, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और कांशीराम जैसे महापुरुषों की तेरहवीं का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि जब इन महापुरुषों ने सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया, तो समाज को भी ऐसी प्रथाओं से दूरी बनानी चाहिए।
हालांकि कार्यक्रम के दौरान चंद्रभान बेसरा ने बहुजन समाज पार्टी और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के कार्यों का उल्लेख करना शुरू किया, जिससे कार्यक्रम का माहौल कुछ समय के लिए राजनीतिक हो गया। इस दौरान वहां मौजूद कुछ सरकारी कर्मचारी कार्यक्रम स्थल से उठकर चले गए।
शोकसभा में छामाधर प्रसाद अध्यापक, खुशालचंद अध्यापक, हल्केराम दाऊ, शालिग्राम सेवा निवृत्त अधिकारी, कालूराम गुढ़ा, डॉ. धर्मदास, डॉ. इमरत लाल, भगतराम अमौरा, राजेंद्र भास्कर, प्रमोद गौतम सहित परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और समाज के अनेक लोग मौजूद रहे।

