मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन एक बहती हुई नदी के समान है, जहाँ किनारे बदलते रहते हैं और लहरें कभी शांत तो कभी उग्र होती हैं। अक्सर कहा जाता है कि इंसान वक्त को नहीं काटता, बल्कि वक्त इंसान को काटता जाता है। किसी अज़ीज़ के साथ होने पर घंटों का समय मिनटों में सिमट जाता है, मानो समय थम गया हो। वहीं, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो समय बदलते ही गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं और हमें भूल जाते हैं। यह दुनिया का दस्तूर है, पर इसे स्वीकार करना ही मानसिक शांति का पहला कदम है। आज के दौर में रिश्ते अक्सर ‘स्वार्थ’ की नींव पर टिके होते हैं। लेखक ने बहुत सटीक बात कही है कि “साथ रहने के लिए स्वार्थ छोड़ना ही बड़प्पन है, परंतु अपने स्वार्थ की खातिर किसी का साथ छोड़ देना इंसानियत की सबसे बड़ी हार है” क्योंकि जब हम किसी के साथ केवल मतलब के लिए जुड़ते हैं, तो वह रिश्ता नहीं बल्कि एक ‘सौदा’ होता है।
सच्चा साथ वह है, जहाँ आप दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूँढते हैं, ना कि उसकी मजबूरी में अपना फायदा। यहां यह विडंबना ही है कि जिन अनजान लोगों को हम खुश करने की कोशिश करते हैं, वे अक्सर कभी हमारे “अपने” नहीं बनते और जो हमारे वास्तव में “अपने” होते हैं, उनकी अपेक्षाएं इतनी गहरी होती हैं कि वे अक्सर अनकही और अधूरी रह जाती हैं। इसलिए अपनी ऊर्जा और प्रेम उन लोगों पर निवेश करें, जो आपकी खामोशी को भी समझ सकें, ना कि उन पर जिन्हें आपकी मौजूदगी का अहसास तक नहीं। वक्त तो गुजर ही जाएगा, परंतु जो यादें हम दूसरों के मन में छोड़ेंगे, वही हमारा असली धन है। इसलिए निस्वार्थ प्रेम करें, अपनों को समय दें और इस बात को समझें कि दुनिया को खुश करने से पहले अपनी आत्मा को संतुष्ट करना ज़रूरी है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

