मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानवीय रिश्तों की नींव प्रेम, विश्वास और सम्मान पर टिकी होती है। लेकिन जब इस नींव में स्वार्थ, द्वेष और धन का अहंकार प्रवेश कर जाता है, तो बरसों पुराने मजबूत रिश्ते भी रेत के महल की तरह ढ़ह जाते हैं। स्वार्थ, द्वेष और अहंकार में जब बेटा पिता की संपत्ति को अपना हक और पिता के बुढ़ापे को बोझ समझने लगे और मित्रता केवल काम निकलवाने का साधन बन जाए तो रिश्तों में दरार आ जाती है क्योंकि स्वार्थ, द्वेष (या ईर्ष्या) और अहंकार वह दीमक है, जो हँसते-खेलते परिवारों को खोखला कर देती है । वहीं भाई-भाई के बीच भी प्रेम तब खत्म हो जाता है, जब एक की उन्नति दूसरे की आँखों में खटकने लगती है । रिश्तों का सबसे बड़ा शत्रु पैसा भी है। जब इंसान के पास धन आता है, तो वह अक्सर अपनों को छोटा और खुद को सर्वोपरि समझने लगता है।
आज के बदलते परिवेश में अमीर रिश्तेदार भी अक्सर गरीब सगे-संबंधियों को नीची नजर से देखने लगते हैं, जिससे वर्षों का मेल-मिलाप अपमान की भेंट चढ़़ जाता है। जायदाद और धन के अहंकार में सगे भाई एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और कोर्ट-कचहरी के चक्करों में पूरा जीवन बर्बाद कर देते हैं। स्वार्थ और पैसे से आप भौतिक सुख तो खरीद सकते हैं, लेकिन सुकून और सच्चा प्रेम नहीं। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े साम्राज्य ढह गए, लेकिन जिन्होंने रिश्तों को धन से ऊपर रखा, उनका नाम और वंश आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। याद रखें: पैसा आता-जाता रहता है, लेकिन टूटा हुआ विश्वास और खोया हुआ रिश्ता कभी वापस नहीं आता। यदि हम अपने मन से इन विकारों को निकाल दें, तो हर घर स्वर्ग बन सकता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

