मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर हम अपने घरों के मुख्य द्वार पर ‘शुभ-लाभ’ की पट्टी लगाते हैं, जो समृद्धि और धन की कामना का प्रतीक है, लेकिन अगर हम इस परंपरा को थोड़ा और विस्तार दें और ‘शुभ लाभ’ के साथ-साथ या उसके स्थान पर ‘शुभ विचार’ को अपने जीवन के द्वार पर स्थान दें, तो इसका प्रभाव चमत्कारिक हो सकता है । हमारे समाज में घर के बाहर ‘शुभ-लाभ’ लिखना एक प्राचीन परंपरा है। ‘शुभ’ यानी पवित्रता और ‘लाभ’ यानी प्राप्ति। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि वास्तविक ‘लाभ’ आता कहाँ से है? लाभ केवल व्यापार या धन से नहीं आता, बल्कि लाभ का मूल स्रोत हमारे ‘विचार’ हैं।
आज के दौर में इंसान के पास धन तो है, लेकिन मानसिक शांति की कमी है। ‘शुभ-लाभ’ की दौड़ में हम तनाव और चिंता को घर ले आते हैं। यदि हम ‘शुभ विचार’ को प्राथमिकता दें—जैसे क्षमा, संतोष, धैर्य और प्रेम—तो घर में सुख-शांति का वास होगा। बिना मानसिक शांति के भौतिक लाभ व्यर्थ है।
‘शुभ-लाभ’ लिखना बुरा नहीं है, लेकिन इसे सार्थक करने के लिए ‘शुभ विचार’ का होना अनिवार्य है। जब हमारी सोच नेक होगी, तो लाभ के अवसर खुद-ब-खुद पैदा होंगे। इसलिए, अपने घर के द्वार के साथ-साथ अपने मस्तिष्क के द्वार पर भी पहरेदार के रूप में ‘शुभ विचार’ रखें। फिर देखिए, आपके जीवन में लाभ ही लाभ होगा—ऐसा लाभ जिसे ना कोई चुरा सकता है और ना ही कभी कम हो सकता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

