पंचशील बुद्ध विहार टिकरापारा में वैचारिक रूप से मनाई गई महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती
दिलीप मैश्राम
बिलासपुर छत्तीसगढ़
11 अप्रैल का दिन बिलासपुर के लिए एक ऐतिहासिक और स्मरणीय दिन बन गया, जब पंचशील बुद्ध विहार के उपासकों द्वारा पहली बार महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती को औपचारिकता से परे जाकर वैचारिक आधारों पर मनाया गया। यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि एक सजग समाज की ओर बढ़ते कदम का सशक्त संकेत था।
इस कार्यक्रम की तैयारी कई दिनों से निरंतर चल रही थी। जयंती के दिन सभी उपासक सुबह से ही व्यवस्थाओं में जुट गए थे। कार्यक्रम का प्रारंभ तय समयानुसार सायं 4 बजे हुआ — जो अपने आप में अनुशासन और प्रतिबद्धता की एक मिसाल रहा।
प्रारंभिक सत्र में बच्चों के लिए ड्राइंग प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसका विषय महात्मा ज्योतिबा फुले और बाबासाहेब के विचारों पर आधारित था। बच्चों ने अत्यंत लगन, संवेदनशीलता और समझ के साथ अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की, जिसने उपस्थित जनों का मन जीत लिया। इसके पश्चात निबंध प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें बच्चों ने महापुरुषों के जीवन, उनके संघर्ष और उनके विचारों को शब्दों में सजीव रूप दिया।
सायं 6 बजे से सांस्कृतिक एवं वैचारिक कार्यक्रम का विधिवत आरंभ हुआ। इस आयोजन की एक विशिष्ट पहचान यह रही कि कार्यक्रम का प्रत्येक चरण निर्धारित समयानुसार सम्पन्न हुआ — जो आज के संदर्भ में एक अनुकरणीय उदाहरण है।
कार्यक्रम की शुरुआत सामूहिक वंदना से हुई, जिसने वातावरण को शांत, अनुशासित और चिंतनशील बनाया। तत्पश्चात मुख्य अतिथि आयुष्मान डॉ. संजीव खुदशाह जी का आगमन हुआ। बच्चों ने कतारबद्ध होकर “जय भीम” के उद्घोष के साथ उनका स्वागत किया, जो अपने आप में अनुशासन और संस्कार का सुंदर प्रतीक था।
इस आयोजन की एक विशेषता ने सभी का ध्यान आकर्षित किया — अतिथियों के स्वागत की परंपरा को एक नए वैचारिक आयाम के साथ प्रस्तुत किया गया। जहां सामान्यतः पुष्पमाला या गुलदस्ते भेंट किए जाते हैं, वहीं यहाँ पुस्तक भेंट कर स्वागत किया गया। मुख्य अतिथि को “बाबासाहेब और उनका मिशन” तथा कार्यक्रम की अध्यक्ष ललिता वाहने ताई को “बुद्ध और विज्ञान” पुस्तक भेंट की गई। यह कदम स्पष्ट रूप से इस विचार को स्थापित करता है कि समाज में वास्तविक परिवर्तन का माध्यम ज्ञान और विचार ही होते हैं।
इसके पश्चात फूले निःशुल्क पाठशाला (पंचशील बुद्ध विहार) के छात्रों द्वारा “प्रबुद्ध भारत” शीर्षक से बहुजन गीत की सामूहिक प्रस्तुति दी गई, जिसने कार्यक्रम को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में ललिता वाहने ताई ने महात्मा ज्योतिबा फुले के जीवन, उनके संघर्षों और उनके सामाजिक योगदान पर गंभीर एवं प्रेरणादायी विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम को स्थानीय सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हुए, फूले निःशुल्क पाठशाला (जैतखाम) के बच्चों द्वारा छत्तीसगढ़ का पारंपरिक पंथी नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इसके पश्चात महिला उपासकों द्वारा मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया और उन्हें संबोधन हेतु आमंत्रित किया गया। अपने उद्बोधन में डॉ. संजीव खुदशाह जी ने महात्मा ज्योतिबा फुले के जीवन की उन निर्णायक घटनाओं पर प्रकाश डाला, जिन्होंने उन्हें जाति व्यवस्था और अशिक्षा के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित किया। साथ ही उन्होंने पंचशील बुद्ध विहार की गतिविधियों की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
कार्यक्रम के अंत में आयुष्मान कमलेश लव्हत्रे भाऊ ने आभार प्रदर्शन करते हुए सभी उपस्थित उपासकों, अतिथियों एवं सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। कार्यक्रम का संचालन आयुष्मान मुकेश गोंडाने भाऊ द्वारा किया गया। यद्यपि यह उनका पहला संचालन अनुभव था, किंतु उनकी प्रस्तुति में अद्भुत आत्मविश्वास और परिपक्वता झलक रही थी।
इस प्रकार, बिलासपुर में पहली बार महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती को एक वैचारिक, अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण स्वरूप में मनाया गया।
यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पहल है — जो आने वाले समय में एक नई परंपरा के रूप में स्थापित होगी और समाज को दिशा देने का कार्य करेगी।










