Friday, April 17, 2026
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“135वीं जयंती पर आत्ममंथन का समय, क्या समाज बाबासाहेब के विचारों को सच में अपना पाया?”

मूकनायक / मुंबई ब्यूरो चीफ
प्रकाश लांडगे

“मेरे विचार मेरी ताकत”
भारतीय समाज के परिवर्तन का इतिहास लिखते समय एक नाम अत्यंत सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है, वह है डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर। उनकी 135वीं जयंती केवल एक उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन, चिंतन और दिशा तय करने का गंभीर क्षण है। क्योंकि बाबासाहेब का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग, विद्रोह और परिवर्तन की जीवंत गाथा है।

मूकनायक की स्थापना से लेकर भारतीय संविधान के निर्माण तक और आगे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की संकल्पना तक, बाबासाहेब ने जो कार्य किए, वे केवल किसी एक वर्ग के लिए नहीं थे, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए थे। उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज उठाई, शिक्षा को हथियार बनाया और न्याय, समानता तथा बंधुत्व के आधार पर समाज निर्माण का मार्ग दिखाया।

बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था – “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन जीने का मार्गदर्शन था। उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, महिलाएं और किसानों के उत्थान के लिए ठोस विचार प्रस्तुत किए। आर्थिक क्षेत्र में उन्होंने औद्योगिकीकरण, कृषि सुधार और श्रमिक अधिकारों पर बल दिया। महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से ऐतिहासिक प्रयास किया। आज जो अधिकार सहज प्रतीत होते हैं, उनके पीछे बाबासाहेब के संघर्ष और दूरदर्शिता की बड़ी भूमिका है।

लेकिन आज एक गंभीर प्रश्न सामने खड़ा है कि क्या समाज ने बाबासाहेब के विचारों को वास्तव में अपनाया है? क्या उनके त्याग और बलिदान की कोई सच्ची अनुभूति है? उन्होंने कहा था, “मैं इस देश को बौद्धमय बनाऊंगा।” इस कथन का अर्थ केवल धर्म परिवर्तन नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और समानता के मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण था। आज उस दिशा में हमारी प्रगति कितनी हुई है, यह विचार करने की आवश्यकता है।

बाबासाहेब ने यह भी कहा था कि इस देश की “शासन करने वाली जमात” बनना होगा। आज बहुजन समाज की संख्या 85 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में उसकी वास्तविक भागीदारी कितनी है? पुणे समझौते के बाद जो अवसर मिले, क्या उनका उपयोग समाज के व्यापक विकास के लिए हुआ, या कुछ लोगों ने उन्हें अपने स्वार्थ तक सीमित रखा? यह एक गहन आत्ममंथन का विषय है।

शिक्षित वर्ग के संदर्भ में बाबासाहेब की अपेक्षा स्पष्ट थी कि जो लोग शिक्षा प्राप्त करें, वे समाज को लौटाएं। उन्होंने कहा था कि अपनी कमाई का बीसवां हिस्सा समाज को देना चाहिए। यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। लेकिन क्या आज शिक्षित वर्ग समाज के लिए समय निकाल रहा है? क्या वह अपने संसाधनों का एक हिस्सा समाज के उत्थान में लगा रहा है? यदि नहीं, तो यह स्थिति चिंताजनक है।

समाज में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में अनेक चुनौतियां बनी हुई हैं। कई विद्यार्थी आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में समाज को आगे आकर छात्रवृत्ति, मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करना चाहिए। बाबासाहेब का सपना केवल कानूनन समानता तक सीमित नहीं था, बल्कि वास्तविक जीवन में समान अवसर उपलब्ध कराना था।

आज 135वीं जयंती के अवसर पर केवल जुलूस, बैनर और नारों तक बाबासाहेब को सीमित रखना उनके विचारों के साथ अन्याय होगा। इसके बजाय हर व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या उसने बाबासाहेब के विचारों को अपने जीवन में उतारा है? क्या समाज के लिए कोई ठोस योगदान दिया है?

आज आवश्यकता है एक सामूहिक संकल्प की। बहुजन समाज में जागरूकता फैलाने की, शिक्षा को प्राथमिकता देने की, सामाजिक एकता को मजबूत करने की और राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ने की। सम्राट अशोक के बौद्धमय भारत का स्वप्न केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायी लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।

अंततः, बाबासाहेब का जीवन प्रेरणा का स्रोत है, लेकिन उनके विचारों को व्यवहार में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। यदि 135वीं जयंती के अवसर पर समाज आत्ममंथन कर जिम्मेदारी स्वीकार करता है और परिवर्तन के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तभी बाबासाहेब के सपनों का भारत साकार हो सकेगा।

आज का दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि संकल्प का है। स्वयं को बदलने का है, समाज को जागृत करने का है और बाबासाहेब के विचारों को जीवन में उतारने का है। यही उनकी जयंती का सच्चा अर्थ है।

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