*किसी भी अश्वेत क्रांतिकारी ने कभी श्वेत महिला से विवाह नहीं किया, लेकिन भारत के तथाकथित अम्बेडकरवादी दलित कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को अंतर्जातीय विवाह के नाम पर सिर्फ ब्राह्मण महिलाएं ही पसंद आती हैं !* – _बीडीपी अध्यक्ष मा. जीवन कुमार मल्ला_
_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_
दिनांक 28 अगस्त, 2022 (रविवार) को महात्मा अयंकाली और श्री नारायणा गुरु की जयंती के अवसर पर *श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली की विरासत और मिशन को कैसे पुनर्प्राप्त करें* नामक शीर्षक से बीबीसीआई मीडिया द्वारा एक जूम बेबीनार का आयोजन किया गया।
दरअसल केरल राज्य में जन्मे श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली का जन्मदिवस अगस्त माह में क्रमशः 26 और 28 तारीख को पड़ता है, इसलिए बीबीसीआई मीडिया द्वारा दोनों महापुरुषों का संयुक्त जयंती बेबीनार आयोजित किया गया।
इस जूम बेबीनार में जुड़े बीडीपी प्रवक्ता *मा. अशोक साकेत* ने सर्वप्रथम दोनों महापुरुषों के जीवन संघर्ष के विषय में संक्षिप्त जानकारी देते हुए बेबीनार की भूमिका स्पष्ट की। तदोपरांत बीडीपी अध्यक्ष *मा. जीवन कुमार मल्ला* ने बेबीनार में जुड़े लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि,
साथियो, आज महात्मा अयंकाली का जन्मदिवस है, इसलिए केरल के दलित-पिछड़े लोग एक प्रथा के तौर पर आज गरीबों में भोजन, कपड़े, कॉपी-पेन आदि सामग्री बांटकर श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली का जन्मदिनोत्सव मनाने में व्यस्त हैं; जबकि यहाँ हम लोग *श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली की विरासत और मिशन को पुनर्प्राप्त करने* के इस विषय पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
श्री नारायणा गुरु का जन्म ओबीसी समुदाय की ‘एझावा’ जाति में हुआ था। श्री नारायणा गुरु का आंदोलन मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ शुरू किया गया *सांस्कृतिक आंदोलन* था। उन्होंने वर्णाश्रम और मनुवाद आधारित जाति-व्यवस्था को नकारते हुए *एक धर्म, एक जाति और एक ईश्वर* के सिद्धांत को अपनाकर लोगों को जागरूक किया। वहीं दूसरी तरफ महात्मा अयंकाली का जन्म दलित समुदाय की ‘इलावा’ जाति में हुआ था। उनका आंदोलन *सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन* था। केरल में जन्मे महात्मा अयंकाली और महाराष्ट्र में जन्मे महात्मा ज्योतिबाराव फुले के जीवन संघर्ष में काफी समानता नजर आती है।
जैसा कि अभी अशोक जी ने बताया कि भारत में दो ब्राह्मण सबसे ज्यादा अमानवीय और क्रूर प्रवृत्ति के रहे हैं, एक *महाराष्ट्र के पेशवा ब्राह्मण* और दूसरे *दक्षिण भारत के नंबूदरी ब्राह्मण*। महाराष्ट्र में पेशवा ब्राह्मणों ने अतिशूद्रों के लिए सार्वजनिक रास्तों से निकलते वक्त गले में मटकी और कमर में झाडू बांधने का विधान बनाया था; जबकि केरल की ‘इलावा’ और तमिलनाडु की ‘नाडार’ जाति के लिए नंबूदरी ब्राह्मणों ने ऐसा विधान बनाया था कि उनके लिए दिन में बाहर निकलने तक कि मनाही थी। वह अदृश्य (Unseeable) जातियां घोषित की गई थीं। केरल में अतिशूद्र महिलाओं को कमर के ऊपर ब्लाऊज पहने तक का अधिकार नहीं था! यह कोई हजार – दो हजार वर्ष पुरानी घटना नहीं, बल्कि 200 वर्ष पुरानी घटनाएं हैं।
ऐसे अमानवीय वातावरण में 28 अगस्त, 1863 को इलावा जाति में महात्मा अयंकाली का जन्म हुआ था। जब वे युवा अवस्था में फुटबॉल खेलने गए तो नंबूदरी और नायर ब्राह्मणों ने उन्हें अछूत कह कर उन्हें अपने साथ खेलने से मना कर दिया। *तब महात्मा अयंकाली ने वहीं पर दृढ़-संकल्प लिया कि आज से इन तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मण और नायरों से हमारा किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं होगा और वे आजीवन अपने संकल्प पर अडिग रहे।*
उन्होंने महात्मा फुले की तरह केरल में शूद्र-अतिशूद्रों के लिए स्कूल खोले। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर से बहुत पहले केरल में *शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो* का नारा सर्वप्रथम महात्मा अयंकाली ने ही दिया। उन्होंने महिलाओं के लिए कमर से ऊपर कपड़े (ब्लाऊज) पहनने का आंदोलन चलाया। सार्वजनिक रास्तों पर अतिशूद्रों को चलने का अधिकार दिलाने के लिए एक बैलगाड़ी में बैलों की जोड़ी को जोत कर निकल पड़े।
नंबूदरी ब्राह्मणों और नायरों ने उनको धमकियां दी, उनका प्रतिकार किया; लेकिन वह डरे नहीं, रुके नहीं। अंततः ब्रिटिश गवर्नमेंट ने उनकी बात मानकर नंबूदरी ब्राह्मणों के अत्याचार से उन्हें बचने के लिए अतिशूद्रों के लिए विशेष अधिकारों की व्यवस्था की और बड़े पैमाने पर उन्हें अलग वसाहट और खेती के लिए जमीनें भी देनी पड़ीं।
केरल में यह सब बदलाव महात्मा अयंकाली और श्री नारायणा गुरु के संघर्षों की बदौलत ही साकार हो सका।
*लेकिन आज श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली के तथाकथित अनुयायी आरएसएस, बीजेपी जैसे मनुवादी गिरोहों में शामिल होकर इन महापुरुषों का आंदोलन चलाने का दावा करते हैं। वहीं कुछ लोग कम्युनिस्ट पार्टियों के सदस्य बनकर विदेश मार्क्स, लेनिन, माओ की क्रांति की बात करते हैं। उन्हें मनुवाद के खिलाफ की गई अपने इन महापुरुषों की सामाजिक, सांस्कृतिक क्रांति दिखाई नहीं देती।*
आज हम बात कर रहे हैं कि *श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली की विरासत और मिशन को कैसे पुनर्प्राप्त किया जाए।* जैसा कि मैंने पहले बताया कि श्री नारायणा गुरु ने संत शिरोमणि गुरु रविदास, सद्गुरु कबीर साहेब, गुरु नानक, गुरु अर्जुन देव, संत गाडगे बाबा और गुरु गोबिंद सिंह जी की तरह *सांस्कृतिक आंदोलन* को आगे बढ़ाया और महात्मा अयंकाली ने महात्मा फुले और बंगाल में नामशूद्र मूवमेंट के जनक हरिचंद और गुरुचंद ठाकुर की तरह *सामाजिक परिवर्तन* का आंदोलन चलाया तथा बहुजन द्रविड समाज को मनुवाद के खिलाफ एक विचार के तहत संगठित किया। इस पूरे संघर्ष में उन्होंने ब्राह्मणों और अपने सिद्धांतों से कभी भी समझौता नहीं किया।
साथियो, मैं नहीं जानता कि आपको पता है कि नहीं, लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार *पश्चिमी देशों में मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, बराक ओबामा आदि जितने भी अश्वेत क्रांतिकारी हुए, उनमें से किसी ने भी श्वेत महिलाओं के साथ विवाह नहीं किया, क्योंकि वे ‘जिनसे संघर्ष उनसे कोई संबंध नहीं’ के सिद्धांत का कड़ाई से पालन करते थे। इसीलिए वे अपने संघर्ष में कामयाब भी हुए। महात्मा अयंकाली ने भी एक बार दृढ़ संकल्प ले लिया तो फिर उन्होंने आजीवन ब्राह्मणों से किसी भी प्रकार का संबंध कायम नहीं किया; लेकिन आज के तथाकथित दलित कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी, विशेषकर तथाकथित अम्बेडकरवादी कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी; इन्हें अंतर्जातीय विवाह के नाम पर हमेशा ब्राह्मण महिलाएं ही पसंद आती हैं। इन्हें अपने पिछड़े, आदिवासी समुदाय में अपने विवाह योग्य महिलाएं नहीं मिलतीं! इस मूर्खतापूर्ण कृत को वे ‘सामाजिक परिवर्तन’ कहते हैं।*
मसलन, बहुजन द्रविड महापुरुषों के संघर्षों की बदौलत जिन तथाकथित दलित बुद्धिजीवियों को शिक्षित होकर शासन-प्रशासन में बड़े ओहदों में पहुंचने का अवसर मिल गया और कुछ हद तक उनकी आर्थिक उन्नति भी हो गई, वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भूल कर *मैं, मेरा और मेरे लिए* वाली मानसिकता के शिकार हो ब्राह्मणों की औलादों का लालन-पालन कर उन्हें आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
साथियो, विचार से समाज को एक आकर मिलता है और विचारों से ही क्रांति पैदा होती है। इसलिए हमें अपने महापुरुषों के संघर्षों और विचारों को कभी नहीं भूलना चाहिए। हमारे समाज ने हमेशा अपने महापुरुषों की आनदेखी की है, इसी का नतीजा है कि 2000 वर्षों से हमारा समाज ब्राह्मणों का गुलाम बना हुआ है।
अगर ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्ति चाहिए, तो हमें अपने देश का शासक बनना होगा। उसके लिए आज हमें सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तन की जरूरत है। इसके लिए कांशीरामवाद ही एकमात्र उपाय है।
मैं कांशीरामवाद को ही एकमात्र उपाय क्यों बात रहा हूँ, क्योंकि मान्यवर कांशीराम जी से पहले हमारे जितने भी महापुरुष हुए, उन्होंने स्थानीय स्तर पर ही मनुवाद के खिलाफ संघर्ष किया। लेकिन मान्यवर कांशीराम जी ही वह पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने देशभर के (महाराष्ट्र से फुले, शाहू, अम्बेडकर; तमिलनाडु से पेरियार, अयोधिदास तासर, शहीद इमानुएल सेकरन; बंगाल से नामशूद्र मूवमेंट के जनक हरिचंद और गुरुचंद ठाकुर; केरल से श्री नारायणा गुरु और महात्मा अयंकाली; पंजाब से गुरु नानक, गुरु गोबिंद सिंह, बाबू मंगुराम मुंगोबालिया; उत्तर प्रदेश से गुरु रविदास, गुरु कबीर, स्वामी अछूतानंद, ललई सिंह यादव, महामना रामस्वरूप वर्मा; बिहार से शहीद जगदेव बाबू, कर्पूरी ठाकुर, बिरसा मुंडा आदि) बहुजन द्रविड महापुरुषों के सामाजिक, सांस्कृतिक संघर्षों को समझकर 6743 जातियों में तोड़े गए दलित, आदिवासी, पिछड़े और धर्मान्तरित समुदायों को बहुजन समाज बनाने तथा देश की बागडोर (सत्ता) अपने हाथों में लेकर अपनी उन्नति स्वयं करने के उद्देश्य से एक बैनर के नीचे संगठित करना शुरू किया।
1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी बनाई और 1993 में (10 वर्षों के अंदर) सदियों से गुलाम बहुजन समाज को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का शासक बना दिया। बहुजन समाज के वे एकमात्र महापुरुष हैं, जिन्होंने 15 राज्यों में बहुजन समाज पार्टी का खाता खोला।
हमारा आंदोलन लगातार कामयाबी की ओर बढ़ रहा था, लेकिन मान्यवर कांशीराम जी की मृत्यु के बाद मायावती एंड कंपनी ने सिद्धान्तों से समझौता कर लिया और बहुजन द्रविड समाज में भाईचारा पैदा कर बहुजन समाज बनाने का काम रोक दिया। परिणामस्वरूप जहाँ से चले थे आज फिर से वहीं पहुँच गए। यानी शून्य से शुरुआत कर, शून्य में ही पहुंच गए।
आज मनुवाद फिर से हावी हो गया है। ऐसी परिस्थिति में अब मान्यवर कांशीराम जी के बहुजन मिशन को पुनर्जीवित कर गति देने का कर्त्तव्य उनके सहयोगी, शिष्य, यानी कांशीरामवादियों का बनता है। इसलिए अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझकर बहुजन द्रविड पार्टी आज इस काम को आगे बढ़ा रही है।
अपना कर्त्तव्य समझकर हमने पेरियार ई.वी.आर. के जन्मदिन के अवसर पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में दिनांक 17 सितंबर, 2022 को देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में निवासरत कांशीरामवादियों को एकत्रित करने के उद्देश्य से *कांशीरामवादियों का मिलन – 2022* नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया है।
इस बेबीनार के माध्यम से हम आपसे भी अपील करते हैं कि 17 सितंबर को सभी कांशीरामवादी दिल्ली पहुंचे और इस परिवर्तन की मुहिम में अपना योगदान सुनिश्चित करें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
जय कांशीराम! जय पेरियार! जय भारत!
_कांशीराम मिशन में.._
*बीबीसीआई समाचार, नई दिल्ली*
+91 9717366805

