Friday, April 17, 2026
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आज का इतिहास

28 फ़रवरी 1950— संविधान लागू होने के कुछ ही सप्ताह बाद—बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने संसद में “Criminal Law Amendment Bill”(अत्याचार निवारण अधिनियम) पर महत्वपूर्ण चर्चा में भाग लिया। भारत के प्रथम विधि मंत्री और संविधान के शिल्पकार के रूप में उनके विचार केवल कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों से प्रेरित थे।
डॉ. आंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था मजबूत, निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून केवल दंड देने का साधन नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा का उपकरण भी है। इसलिए आपराधिक कानूनों में किसी भी प्रकार का संशोधन संविधान की भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—के अनुरूप होना चाहिए।

स्वतंत्रता और विभाजन के बाद के संवेदनशील दौर में देश के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में डॉ. आंबेडकर ने राज्य की शक्ति और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था—लोकतंत्र में कानून का शासन (Rule of Law) सर्वोपरि होना चाहिए, न कि मनमानी सत्ता।

यह संसदीय बहस इस बात का प्रमाण है कि डॉ. आंबेडकर केवल संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी विधि चिंतक भी थे, जो चाहते थे कि भारत का न्याय तंत्र पारदर्शी, उत्तरदायी और जनहितकारी बने।
बोधिसत्व बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर को कोटि कोटि नमन वंदन 🙏🙏🙏

बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया भारतीय बौद्ध महासभा राजस्थान दक्षिण

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