


गौतम बालबोदरे की खास रिपोर्ट/ मूकनायक छत्तीसगढ़
बिलासपुर -डॉ. भीमराव अंबेडकर चौक आज सिर्फ एक चौराहा नहीं रहा, बल्कि जनभावनाओं का संगम बन गया। यूजीसी बिल के समर्थन में यहां ऐसी विशाल सभा हुई कि राहगीरों को लगा मानो लोकतंत्र ने खुद माइक पकड़ लिया हो। बैनर था – SC /ST/ OBC/ MIN महासंघ, छत्तीसगढ़िया सर्व समाज और सर्व हिंदू समाज छत्तीसगढ़ का संयुक्त मोर्चा; और मंच पर था जोश, नारे और “अबकी बार—बिल लागू सरकार!” का स्वर।
सभा में हजारों लोगों की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि मुद्दा अब फाइलों से निकलकर सड़कों पर आ चुका है। वक्ताओं ने कहा—“यह बिल कोई कागज़ी घोड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की रफ्तार है।” ज्ञापन के जरिए कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम संदेश भेजा गया कि बिल को कड़े प्रावधानों के साथ शीघ्र लागू किया जाए, ताकि SC, ST, OBC समुदायों, महिलाओं और दिव्यांगजनों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय न हो।
वक्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हुई जांच का हवाला देते हुए कहा कि जातिगत भेदभाव और अत्याचार के कई मामले सामने आए हैं। उनका तर्क था कि इसी पृष्ठभूमि में यह बिल लाया गया, लेकिन कुछ लोगों ने अदालत से स्थगन आदेश प्राप्त कर इसकी राह में स्पीड ब्रेकर लगा दिया। अब जनता चाहती है कि सरकार इस स्पीड ब्रेकर को हटाकर सामाजिक समता की गाड़ी को फिर से हाईवे पर दौड़ाए।
प्रांतीय अध्यक्ष सुभाष परते ने मंच से कहा, “यूजीसी बिल स्वागतयोग्य है। यह केवल कानून नहीं, बल्कि समतामूलक समाज की आधारशिला है।” उनके इस कथन पर भीड़ ने तालियों से ऐसा समर्थन दिया, मानो बिल अभी-अभी लागू हो गया हो।
रैली जब अंबेडकर चौक से निकली तो नारे हवा में तैर रहे थे और संदेश साफ था—“न्याय में देरी, अब नहीं चलेगी।” ज्ञापन सौंपते समय प्रतिनिधिमंडल ने मांग दोहराई कि केंद्र सरकार शीघ्र हस्तक्षेप कर बिल को प्रभावी बनाए।
कार्यक्रम में श्याम मूरत कौशिक, सुरेश दिवाकर, सुभाष परते, लखन सुबोध, डॉ. रघु साहू, एडवोकेट दिलीप कौशिक, सीए विष्णु दत्त बघेल, मनोज मरावी, सूरज मरकाम सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक उपस्थित रहे। मंच से लेकर मैदान तक एक ही भाव था—“बिल लागू करो, भेदभाव बंद करो।”
अंत में आयोजकों ने कहा कि यह आंदोलन किसी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज में समानता के पक्ष में है।
जनता की मांग अब स्पष्ट है—यूजीसी बिल को जल्द लागू कर सामाजिक न्याय की फाइल को ‘अति आवश्यक’ में डाल दिया जाए। लोकतंत्र के इस रंगमंच पर आज जनता ने अपनी भूमिका निभा दी है, अब बारी सरकार की है।


