साल १८९७ और १९९७ मैं मुंबई और पुणे मैं प्लेग ने हाहाकार मचादिया ,एक पल मैं असंख्य लोग मरने लगे ! बुखार आना, बगल मैं गांठ आना मतलब मृत्यु निश्चित ! बहोत भयानक परिस्तिथि थी !
इसे देवी का पापक्रोप जानकार लोग वैद्यकीय इलाज नकार देते थे ! बहोत लोग पुणे छोड़ सुरक्षित जगह चले गए ! सावित्रीबाई भी कही और जा सकती थी और अपने जान बचा सकती थी ! लेकिन ज्योतिबा फुले ने जो उन्हें निस्वार्थ भाव से जन सेवा का बीड़ा दिया था सावित्रीबाई ने उसे मरते दम तक निभाया।
सावित्रीबाई ने अपने दूर रहनेवाले डॉक्टर बेटे को खत लिखकर उसे बुलाया और पुणे मैं उन्होंने अस्पताल शुरु किया। सावित्रीमाँ लोगो के घर जा जा के लोगो से उनकी पूछताछ करती थी ।अगर कोई बुखार से पीड़ित हो तो उन्हें वह अपने पीठ पे उठाकर अस्पताल ले जाती थी।
लोगो की सेवा करते करते उन्हें भी प्लेग की बीमारी हो गई और १० मार्च १८९७ को उनकी मृत्यु हो गयी।

