मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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रिश्ते मानव जीवन की सबसे अनमोल पूंजी हैं। चाहे वे पारिवारिक हों, दोस्ती के हों या व्यावसायिक, हर रिश्ते की बुनियाद में संवाद एक मजबूत धागे की तरह पिरोया होता है। जब तक बातचीत जारी रहती है, तब तक समस्याओं के समाधान और सुलह की गुंजाइश बनी रहती है। इसलिए बच्चों के झगड़ों में बड़ों को और सास-बहू के झगडों में बाप-बेटे को कभी नहीं पड़ना चाहिए । संभव है कि दिन में सास-बहू में कुछ कहा-सुनी हो जाए तो वे इसकी शिकायत रात को घर लौटे अपने पति से करेंगी। पतियों को उनकी शिकायत गौर से सुननी चाहिए, सहानुभूति भी दिखानी चाहिए। मगर सुबह जब सो कर उठें तो ‘आगे पाठ पीछे सपाट’ की नीति ही अपनानी चाहिए, तभी घर की एकता कायम रह सकती है।
भले ही लड़ लेना, झगड़ लेना, पिट जाना, पीट देना, मगर बोलचाल बंद मत करना, क्योंकि बोलचाल के बंद होते ही सुलह के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं।गुस्सा बुरा नहीं है । गुस्से के बाद आदमी जो बैर पाल लेता है, वह बुरा है। गुस्सा तो बच्चे भी करते हैं, मगर वे बैर नहीं पालते। वे इधर लड़ते-झगड़ते हैं और उधर अगले ही क्षण फिर एक हो जाते हैं। कितना अच्छा रहे कि हर कोई इंसान बच्चा बनकर ही रहे। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने मतभेदों को प्रबंधित करना सीखें, ना कि उनसे भागना। अपनी भावनाओं को व्यक्त करें, भले ही वे गुस्से वाली हों, लेकिन बातचीत की डोर को कभी ना छोड़ें। जहां बोलचाल खत्म हो जाती है, वहां सिर्फ खालीपन और पछतावा रह जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

