

मूकनायक/ गौतम बालबोंदरे
छत्तीसगढ़
आज से करीबन पचास वर्ष पूर्व 1974-75 की बात है जब मैं BSc के फायनल ईयर में था, तब गुरूजी सिबू सोरेन के जन आन्दोलन का समाचार असमाचार पत्रों में खूब छपता था. तब यह तीर कमान धारी आदिवासियों का जमीन लुटेरे जमींदारों से अपने जमीं और जंगल बचाने का संघर्ष सुर्ख़ियों में होता था जिसका नायक सिबू सोरेन नामक व्यक्ति होता था. तब आदिवासी और आदिवासियत की मेरी जानकारी छात्रवृति के पात्रता तक ही सिमित थी.
हजारीबाग जिले के नेमरा (रामगढ़) गाँव के सोबरन (शिव बरन का अपभ्रंश) के पुत्र बालक सिबू के दिशोम गुरुजी बनने की संघर्ष गाथा भी आदिवासियों के इतिहास में पन्ना मोड़कर दबा दिया गया है. बालक सिबू के मन मस्तिष्क में १३ वर्ष के किशोर वय में जमींदारों के गुंडों द्वारा अपने पिता के नृसंस हत्या का लोमहर्षक सिनेम के दृश्य ररह “फ्रीज” हो गया था. इस लिए प्रतिशोध और क्रांति की चिंगारी सिबू के अन्दर सुलग रही थी. उसने युवावस्था में ही जमींदारों महाजनों के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाना प्रारंभ किया. उन्होंने किसानो, मजदूरों को एकजुट किया और “धान कटनी आन्दोलन” शुरू किया. अविभाजित बिहार के आदिवासी क्षेत्र झारखंड में अत्याचारी जमींदार और सूदखोर महाजन लोग गरीब आदिवासियों , किसानो मजदूरों के गरीबी और भुखमरी का फायदा उठाते हुए उनकी जमीन गिरवी रख लेते थे. धान बोनी आदिवासी किसानो से ही करवाते थे लेकिन फसल जमींदार / महाजन लोग ही अपने गुर्गों के द्वारा कटवा लेते थे. सिबू ने ही आदिवासियों किसानो को संगठित कर यह एलान कर दिया कि “जो बोयेगा वही फसल काटेगा”. और आदिवासी समाज मिलजुलकर धान की फसल काटने लगे. इस तरह से “धान कटनी” आन्दोलन शुरू हो गया. लेकिन इस राह में कई रक्तिम संघर्षों का सामान भी करना पड़ा. इस आन्दोलन से सिबू सोरेन दिशोम गुरूजी के नाम से प्रसिद्ध हो गए. दिशोम का मतलब समाज को दिशा दिखानेवाला. पीड़ित शोषित आदिवासी समाज को एक जुझारू अगुआ मिल गया और लोग उनके पीछे लामबंद होने लगे. अत्याचारी जमीदारो, सूदखोर महाजनों, कुटिल कोल माफिया, और भूमि के भूखे भू माफिया और पथ भ्रष्ट प्रशासन से त्रस्त आम जनता के लिए भी दिशोम गुरु जी एक जुझारू जन नायक के रूप में उभरे.
उन्होंने झारखंड वासियों के लिये बिहार से पृथक राज्य के मांग का बिगुल फूंक दिया. झारखंड मुक्ति के लिए एक जन आन्दोलन प्रारम्भ हो गया. जो आगे चलकर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के रूप में राजनितिक शक्ति का संवाहक बना. वे आदिवासियों गरीब किसानो और मजदूरो के प्रति अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ सतत लड़ते रहे. उन पर कई मुकद्दमे दर्ज हुए. जेल भी गए. अंततः उनका संघर्ष अलग झारखण्ड राज्य के रूप साकार हुआ. वे झारखण्ड राज्य के तीन बार मुख्य मंत्री बने लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच के मारे कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. सांसद और राज्य सभा सदस्य भी चुने गए. भारत सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी रहे. लेकिन अपने समुदाय और समाज के हितों के लिए सतत संघर्ष रत रहे.
उनकी सोच और संघर्ष की उर्जा पार्थिव शारीर से मुक्त होकर जन-मन में संचरित हो … प्रस्फुटित हो …व्याप्त हो…. ऐसी कामनाओं के साथ… जोहार … हूल जोहार…
(-रमेश चन्द्र श्याम)

