प्रविण बागडे :- नागपूर
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भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण कल्याणकारी राजा जिसने न केवल सम्पूर्ण भारत पर बल्कि भारत के अधिकांश भागों पर विजय प्राप्त की। भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य का महत्व अद्वितीय है। अशोक मौर्य एक भारतीय सम्राट और मौर्य वंश के तीसरे शासक थे। मौर्य वंश के सम्राट चंद्रगुप्त से लेकर सम्राट अशोक तक सभी राजाओ ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी है। इस राजा की परंपरा में, इतिहास में सम्राट अशोक की भूमिका कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है। अशोक मौर्य सम्राट बिन्दुसार के कई पुत्रों में अंतिम से दूसरा पुत्र था। इसलिए किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि अशोक मौर्य सम्राट बनेगा। लेकिन अशोक की योद्धा होने की क्षमता संभ्रमित थी, इसलिए स्वाभाविक रूप से अन्य भाइयों का उसके प्रति आक्रोश बढ़ गया। जब चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपनाया और राज्य के सुखों को त्याग दिया, तो उन्होंने अपनी तलवार फेंक दी, वह तलवार अशोक ने ढुंढकर अपने पास रख ली। अशोक बचपन में बहुत ही जोशीला और शरारती था एवं वह एक अच्छा शिकारी भी था। उन्होंने उस समय के राजकुमारों को उपलब्ध सभी शिक्षा प्राप्त की। एक योद्धा के रूप में उनके गुणों को पहचानते हुए, बिन्दुसार ने उन्हें युवावस्था में अवंती विद्रोह को कुचलने के लिए भेजा, यह कार्य जिसे उन्होंने आसानी से पूरा किया। प्राचीन भारत के इतिहास में अशोक को एक महान चक्रवर्ती सम्राट के रूप में मान्यता प्राप्त है। तत्कालीन अशोक के शिलालेख इसके महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। ऐसा विश्वविजेता सम्राट अशोक जिन्हें ‘चक्रवर्ती’ और ‘अशोक द ग्रेट’ नामों से भी जाना जाता है।
सम्राट अशोक को भारतीय इतिहास में सबसे महान और सबसे शक्तिशाली सम्राट माना जाता है, जो विश्व के सबसे महान सम्राट थे। प्राचीन भारत की परंपरा में चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि उन महान सम्राटों को दी जाती थी, जिन्होंने आम जनता के साथ-साथ भारत के एक बड़े भूभाग पर भी शासन किया हो। सम्राट अशोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट’ भी कहा जाता था, चक्रवर्ती सम्राट का अर्थ है ‘सम्राटों का सम्राट’। अशोक का साम्राज्य वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बांग्लादेश से लेकर दक्षिण में केरल तक, तथा नेपाल, भूटान, ईरान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान तक फैला हुआ था। अत्यंत बहादुर जिसने अपने जीवन में एक भी युध्द नहीं हारा ऐसे चक्रवर्ती सम्राट अशोक जिसकी दुनिया में कोई भी तोड नहीं। सम्राट अशोक के साम्राज्य का विस्तार इतना था जितना पूर्ण भारत देश भी नहीं था तथा इस देश पर मौर्य शासकों ने जितने वर्षों तक शासन किया उतना उनसे पहले या बाद में कोई भी कर नही सका।
सम्राट अशोक सत्य, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता और शाकाहारी जीवनशैली के महान समर्थक थे इसलिए इतिहास में उनकी एक बहुत ही उदार प्रशासक के रूप में पहचान थी। अशोक ने अपने शिलालेखों के माध्यम से अपनी प्रजा और प्रशासनिक अधिकारियों को कुछ शाही निर्देश दिये थे। अशोक के शिलालेख मौर्य इतिहास के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में जाने जाते। अशोक के शिलालेखों को 1837 में पढ़नेवाले पहले व्यक्ति ब्रिटिश विद्वान जेम्स प्रिंसेप थे, जो कई भाषाओं के विद्वान थे। अशोक के शिलालेख तीन लिपियाँ ब्राह्मी, खरोष्ठी और अरेमाइक में पाए गए। उसमें से कई शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं जो जेम्स प्रिंसेप द्वारा पढ़े गए थे, जिससे विद्वानों को इस चक्रवर्ती सम्राट के जीवन और समग्र रूप से मौर्य साम्राज्य के बारे में गहन जानकारी मिली है। अशोक ने अपने शिलालेख में स्वयं को ‘देवानाम प्रिय’ करके संबोधित किया है। शिलालेख में कलिंग युद्ध के बाद उनके हृदय परिवर्तन, बौद्ध धर्म स्वीकार करना, बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और धर्म के प्रसार के समग्र कार्य तथा महामात्र की नियुक्ति का उल्लेख है। सम्राट अशोक इस काल में अखंड भारत के पहले चक्रवर्ती राजा थे। सम्राट का अर्थ है एक शक्तिशाली शासक और विजेता जिसके रथ और घोड़े को चारों ही दिशाओं में रोका नहीं जा सकता।
कलिंग युद्ध इतिहास की एक बहुत ही अनोखी घटना मानी जाती है। इतिहासकारों का मानना है कि अशोक का कार्य पूरे विश्व में बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए काफी हद तक प्रशंसनिय थे। अशोक ने पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध परिषद का आयोजन किया। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। उन्होंने धर्म के प्रसार के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के देशों में बौद्ध भिक्षुओं को भेजा तथा कई स्तूपों और मठों का निर्माण कराया। इसी प्रकार अशोक ने अनेक सुख-सुविधाओं के सृजन पर जोर दिया। उदाहरण के लिए उन्होंने यह तय किया कि लोगों के साथ-साथ पशुओं को भी मुफ्त चिकित्सा उपचार मिल सके। उन्होंने अनेक नई सड़कें बनवाईं, यात्रा के दौरान लोगों को छाया प्रदान करने के लिए सड़कों के दोनों ओर पेड़ लगवाए, नई धर्मशालाएं बनवाईं, कुएं खुदवाए और इस तरह उन्होंने अनेक जनसेवा और कल्याणकारी कार्य किए। इसी प्रकार अशोक ने भी बौद्ध धर्म को बड़े पैमाने पर प्रसार और प्रचार करने का काम किया।
धम्मचक्र प्रवर्तन करनेवाले अशोक प्राचीन भारत के सबसे महान और प्रभावशाली शासकों में से एक बन गए जिससे इतिहास को युगों तक उनका स्मरण करना पड़ेगा। कई इतिहासकारों ने अशोक के कार्यों की प्रशंसा एक बुद्धिमान और शुभचिंतक शासक के रूप में की है, जो लोगों के कल्याण के लिए अथक प्रयास करता रहा। एक बौद्ध सम्राट के रूप में अशोक का मानना था कि बौद्ध धर्म सभी मनुष्यों, जानवरों और पौधों के लिए फायदेमंद था, इसलिए उन्होंने दक्षिण एशिया में बौद्ध भिक्षुओं के लिए कई स्तूप, संघार, मठ, चैत्य और विहार बनवाए। अशोक के अनुसार उसने बुद्ध के अवशेषों पर 84 हजार स्तूपों के निर्माण का आदेश दिया था और इतिहास इसका गवाह है। यद्यपि यह कुछ हद तक अतिशयोक्ति है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान भारत में कई स्थानों पर स्तूपों का निर्माण किया गया था। उनके कार्य का प्रमाण 90 के दशक में एक बौद्ध स्थल की खोज है। यह स्थान कर्नाटक के कलबुर्गी जिले में भीमा नदी के तट पर है। इस स्थान को पुनर्जीवित करने का कार्य अभी चल रहा है।
अशोक के बाद उपयुक्त उत्तराधिकारी के अभाव के कारण मौर्य साम्राज्य का पतन हो गया। मौर्य सम्राट अखिल भारतीय स्तर पर एक बड़े और केंद्रीकृत राज्य के निर्माण का प्रयास करनेवाले पहले सम्राट थे। इसमें चन्द्रगुप्त और सम्राट अशोक का कार्य बहुत महत्वपूर्ण रहा है। बौद्ध धर्म की शिक्षा देते समय अशोक ने कल्याणकारी राज्य के निर्माण को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि कोई भी राज्य शांति के माध्यम से लंबे समय तक टिक सकता है। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रसार को बढ़ावा दिया, इसके लिए उन्होंने सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति की और अपने बेटों को धर्म के प्रसार के लिए भेजा। धम्मचक्र प्रवर्तन करनेवाले अशोक प्राचीन भारत के महान एवं चक्रवर्ती शासक हुए हैं, जो लोग मानवकल्याण के लिए मिलकर काम करते हैं वे बुद्धिमान हैं और प्रजा ही दक्ष एवं प्रजा कल्याणकारी शासक कहकर कई इतिहासकारों ने अशोक के कार्यों का गौरान्वित किया।
माधव कोंडविलकर अपनी पुस्तक ‘देवांचा प्रिय राजा प्रियदर्शी सम्राट अशोक’ में कहते हैं कि, "कुछ मामलों में चक्रवर्ती सम्राट अशोक की तुलना अलेक्झांडर द ग्रेट, ऑगस्टस सीझर, चंगीजखान, तैमूर, रशिया के प्रथम पीटर या प्रथम नेपोलियन से की जा सकती है; लेकिन सम्राट अशोक सिकंदर की तरह अति महत्वाकांक्षी नहीं थे। ऑगस्टस सीजर की तरह वे एक आदर्श शासक थे; लेकिन अशोक कभी नहीं चाहते थे कि उन्हें एक तानाशाह के रूप में जाना जाए, जैसा कि सीजर ने किया। वह कभी भी इस तरह से नहीं जाना चाहते थे। अशोक एक शक्तिशाली सेनापति थे; लेकिन अशोक प्रथम नेपोलियन के विपरीत थे, जो हमेशा अपने पराक्रम और जीत से असंतुष्ट रहता था। वह ईमानसे चाहता था कि उसकी प्रजा उससे प्यार करे, “मन की महानता या बड़प्पन, मन में भावना की शुद्धता, स्वभाव की ईमानदारी, स्वयं की गरिमा या सम्मान का स्पष्ट और शुद्ध विचार और दिल में सभी के लिए प्यार, ये विशेषताएं थीं जो अशोक को दूसरों से अलग करती थीं और उन्हें गौतम बुद्ध या ईसा मसीह की श्रेणी में रखती थीं”।
अशोक की सफलता से उसके भाइयों की नाराजगी और बढ़ गई तथा घर में बढ़ती अशांति और सुसीम द्वारा बिंदुसार को अशोक के विरुद्ध भड़काने के कारण बिन्दुसार ने इस विवाद के अस्थायी समाधान के लिए अशोक को कुछ समय के लिए अज्ञातवास में जाने की सलाह दी, जिसका उसने पालन किया। इस अवधि के दौरान अशोक कलिंग गए और वहीं रहे। इस दौरान उनकी मुलाकात कौरवाकी इस मछुआरी युवती से हुई। बाद में वह अशोक की दूसरी या तीसरी पत्नी बनीं। अशोक के कुछ उत्कृष्ट कार्यो में उसका उल्लेख है। इस बीच उज्जैन में एक हिंसक विद्रोह हुआ और बिंदुसार ने अशोक को अज्ञातवास से बाहर आकर विद्रोह को दबाने के लिए कहा। अशोक उज्जैन गया और एक युद्ध में घायल हो गया। ऐसा माना जाता है कि उस समय सुसीम ने अशोक पर कई हिंसक हमले किये थे, जिन्हें उसने विफल कर दिया था। अशोक की देखभाल के लिए बौद्ध सेवकों को नियुक्त किया गया था। अशोक ने इनमें से एक परिचारिका देवी से विवाह किया। देवी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। बिंदुसारको यह विवाह पसंद नहीं आया क्योंकि वह बौद्ध थी। उसने अशोक को पाटलिपुत्र में रहने से मना कर दिया और अशोक को उज्जैन का प्रमुख बना दिया।
अशोक ने अपने शासनकाल में राज्य में कई अस्पताल और राजमार्गों का जाल बिछाया और ऐसा माना जाता है कि सड़कों के किनारे पेड़ लगाने का विचार अशोक का ही था। उन्होंने सम्राट के रूप में अपनी शक्ति का लाभ सामाजिक कार्यों के लिए उठाया। उसके बाद अशोक को धम्म अशोक कहा जाने लगा। अशोक ने धम्म के मुख्य नैतिक सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला, जिनमें अहिंसा, सभी जातियों और धर्मों के प्रति सहिष्णुता, बड़ों के प्रति सम्मान, संतों और शिक्षकों के प्रति उचित सम्मान तथा दासों के प्रति मानवीय व्यवहार शामिल थे। दुनिया का कोई भी समाज ऐसे नैतिक सिद्धांतों को अस्वीकार नहीं कर सकता। अशोक के इतिहासकारों के अनुसार कलिंग युद्ध के बाद उसने कोई बड़ा युद्ध नहीं किया, लेकिन वह हमेशा पड़ोसी देशों जैसे कि ग्रीक राज्यों और चोल साम्राज्य के साथ युद्ध की संभावना होती थी। लेकिन भले ही अशोक ने अपने पिछले अभियानों और मगध की शक्ति के कारण बौद्ध धर्म अपना लिया था, लेकिन उसके पड़ोसी राज्यों ने उसे चुनौती देने की हिम्मत नहीं की। यद्यपि उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया और अहिंसा को राष्ट्रीय नीति बनाया, फिर भी उन्होंने मगध की सैन्य शक्ति को अबाधित रखा। यह सर्वविदित है कि अशोक को यूनानी दुनिया का ज्ञान था। यह भी ज्ञात है कि चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा यूनानियों के विरुद्ध किए गए अभियानों के कारण मौर्य साम्राज्य की ख्याति ग्रीस और इजिप्त तक पहुंच गई थी।
सम्राट अशोक जिनका महिमामंडन पूरे विश्व ने किया, दुर्भाग्यवश भारत में कुछ समय के लिए वे गुमनामी में चले गए और आज देश को उस स्मृति को जगाने की अत्यंत आवश्यकता है। क्योंकि हम यह भूला नही सकते कि यह देश अशोक का है।

