मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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समाज में किसी जरूरतमंद को बार-बार भीख या दान देना क्षणिक राहत तो दे सकता है, लेकिन यह उसकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। सच्चा परोपकार किसी की मजबूरी का सहारा बनना नहीं, बल्कि उसे इस काबिल बनाना है कि उसे कभी किसी के सहारे की जरूरत ही ना पड़े। जब हम किसी को बार-बार बिना किसी मेहनत के धन या भोजन देते हैं, तो अनजाने में हम उसे निर्भरता की बेड़ियों में जकड़ देते हैं। इससे व्यक्ति का आत्मसम्मान खत्म होने लगता है और उसमें आलस्य व हीनभावना पनपने लगती है। इसके विपरीत, जब हम किसी को सक्षम और आत्मनिर्भर बनाते हैं, तो उसके दूरगामी परिणाम होते हैं क्योंकि शिक्षा, कौशल या रोजगार के साधन मुहैया कराने से व्यक्ति जीवनभर सम्मान के साथ अपनी जीविका कमा सकता है।
एक सक्षम व्यक्ति ना केवल अपना, बल्कि अपने पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी का भविष्य संवार लेता है। अपने पसीने की कमाई से जीने वाले व्यक्ति का आत्मविश्वास और समाज में उसका गौरव बढ़ता है। भीख या बिना सोचे-समझे दिया गया दान अक्सर मजबूरी को बढ़ावा देता है, जबकि सक्षमता का दान इंसान को स्वतंत्र बनाता है। यदि हम वास्तव में समाज का कल्याण करना चाहते हैं, तो हमें ‘दान देने’ की मानसिकता से ऊपर उठकर ‘योग्य बनाने’ की सोच अपनानी होगी। किसी को अपने पैरों पर खड़ा करना ही ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा और सर्वश्रेष्ठ परोपकार है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

