मूकनायक/रिपोर्टर, राजेश कुमार/बस्ती/उत्तर प्रदेश
लखनऊ। 2 जुलाई 2026; सुल्तानपुर ऑटोनॉमस स्टेट मेडिकल कॉलेज, सुल्तानपुर में इंडियन सोसायटी ऑफ हाइपरटेंशन (ISH) उत्तर प्रदेश चैप्टर द्वारा प्रथम वार्षिक कॉन्फ्रेंस “Hypertension 2026” का भव्य आयोजन किया गया। सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों, शिक्षण संस्थानों एवं अस्पतालों से आए वरिष्ठ चिकित्सकों, हृदय रोग विशेषज्ञों, फिजिशियन, मेडिकल शिक्षकों, रेजिडेंट डॉक्टरों एवं मेडिकल विद्यार्थियों ने भाग लिया।
सम्मेलन की आयोजन समिति में डॉ. बी. एस. नारायण (चेयरमैन), डॉ. अनुज माहेश्वरी (सेक्रेटरी जनरल), डॉ. नरसिंह वर्मा (साइंटिफिक चेयरमैन), डॉ. साजिद अंसारी (सेक्रेटरी) तथा डॉ. राजू श्रीवास्तव (ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी) की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आयोजन समिति ने सम्मेलन का उद्देश्य चिकित्सकों को उच्च रक्तचाप के नवीनतम वैज्ञानिक शोध, आधुनिक उपचार पद्धतियों एवं रोकथाम की रणनीतियों से अवगत कराना बताया।
सम्मेलन के वैज्ञानिक सत्र में डॉ. सतीश कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ ने “Hypertension in Young Adults – The Silent Epidemic: From Lifestyle to Genetics” विषय पर प्रभावशाली एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उनका व्याख्यान सम्मेलन का प्रमुख आकर्षण रहा, जिसे उपस्थित चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों ने अत्यंत सराहा।
डॉ. सतीश कुमार ने कहा कि आज उच्च रक्तचाप केवल वृद्धावस्था का रोग नहीं रह गया है, बल्कि तेजी से युवा वर्ग को अपनी चपेट में ले रहा है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अधिकांश युवाओं को यह पता ही नहीं होता कि वे उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इसी कारण इसे “साइलेंट एपिडेमिक” अर्थात “मूक महामारी” कहा जा रहा है।
उन्होंने बताया कि बदलती जीवनशैली युवा पीढ़ी में उच्च रक्तचाप का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है। फास्ट फूड एवं अत्यधिक नमक का सेवन, मोटापा, नियमित व्यायाम का अभाव, लंबे समय तक मोबाइल एवं कंप्यूटर का उपयोग, अपर्याप्त नींद, धूम्रपान, शराब का सेवन, मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धात्मक जीवनशैली तथा अनियमित दिनचर्या रक्तचाप बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यदि इन कारकों पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में युवाओं में हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी रोग एवं समय से पहले मृत्यु के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
अपने व्याख्यान में डॉ. सतीश कुमार ने जेनेटिक्स की भूमिका पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जिन परिवारों में माता-पिता या निकट संबंधियों को उच्च रक्तचाप, मधुमेह अथवा हृदय रोग रहा है, उनके बच्चों में भी भविष्य में उच्च रक्तचाप होने का जोखिम सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक होता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि आनुवंशिक प्रवृत्ति होने का अर्थ यह नहीं है कि रोग निश्चित रूप से होगा। यदि व्यक्ति स्वस्थ जीवनशैली अपनाए, नियमित व्यायाम करे, संतुलित भोजन ले, वजन नियंत्रित रखे तथा समय-समय पर रक्तचाप की जांच कराए, तो इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता केवल उपचार की नहीं, बल्कि रोकथाम (Prevention) की है। प्रत्येक युवा को 18 वर्ष की आयु के बाद समय-समय पर अपना रक्तचाप अवश्य जांचना चाहिए। यदि परिवार में उच्च रक्तचाप का इतिहास हो या व्यक्ति मोटापे, मधुमेह अथवा अन्य जोखिम कारकों से ग्रस्त हो, तो नियमित स्वास्थ्य जांच और भी आवश्यक हो जाती है।
डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि उच्च रक्तचाप की रोकथाम के लिए प्रतिदिन कम से कम 30–45 मिनट व्यायाम, संतुलित एवं कम नमक वाला आहार, ताजे फल एवं हरी सब्जियों का अधिक सेवन, धूम्रपान एवं शराब से दूरी, पर्याप्त नींद तथा योग, ध्यान एवं तनाव प्रबंधन जैसी आदतों को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। उन्होंने चिकित्सकों से भी आह्वान किया कि वे केवल दवाइयों तक सीमित न रहें, बल्कि प्रत्येक रोगी को जीवनशैली सुधारने के लिए प्रेरित करें।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने नवीन शोधों, भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों तथा समय पर पहचान एवं उपचार की रणनीतियों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि युवाओं में उच्च रक्तचाप की शीघ्र पहचान कर उचित जीवनशैली परिवर्तन और आवश्यकता पड़ने पर समय पर उपचार शुरू किया जाए, तो भविष्य में हृदयाघात, स्ट्रोक, किडनी फेल्योर तथा अन्य गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।
सम्मेलन में उपस्थित विशेषज्ञों ने भी युवा वर्ग में बढ़ते उच्च रक्तचाप को सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती बताते हुए जन-जागरूकता अभियान चलाने, नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रम आयोजित करने तथा स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने पर बल दिया।
कार्यक्रम के अंत में आयोजन समिति ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं अतिथियों का आभार व्यक्त किया। उपस्थित चिकित्सकों ने इस सम्मेलन को अत्यंत सफल एवं ज्ञानवर्धक बताते हुए भविष्य में भी ऐसे वैज्ञानिक सम्मेलनों के नियमित आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया। विशेषज्ञों का मत था कि इस प्रकार के कार्यक्रम चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देने के साथ-साथ समाज में उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर लेकिन रोकी जा सकने वाली बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

