मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव मन असीम ऊर्जा का केंद्र है, लेकिन यह अत्यंत चंचल और अस्थिर भी है। प्रसिद्ध कथन भी है कि “जब तक मन को अनुशासित और एकाग्र नहीं किया जाता, तब तक जीवन में शांति और सफलता प्राप्त करना असंभव है।” यह पंक्ति इस सत्य को रेखांकित करती है कि बाहरी दुनिया को जीतने से पहले हमें अपने भीतर के संसार यानी अपने मन पर विजय प्राप्त करनी होती है। एक अनुशासित मन हमें सोशल मीडिया, आलस्य और व्यर्थ की चिंताओं जैसे विकर्षणों से दूर रखता है। अनुशासन से संकल्प शक्ति मजबूत होती है, जिससे व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानता और अपने काम में लगा रहता है।
जब मन एकाग्र होता है, तो विचारों का अनावश्यक शोर थम जाता है। बिखरे हुए विचार ही मानसिक अशांति और तनाव का मुख्य कारण हैं । जब हम शांत और एकाग्र मन से कोई काम करते हैं, तो उसमें गलतियों की गुंजाइश खत्म हो जाती है और परिणाम उत्कृष्ट मिलता है। दैनिक जीवन में योग और मेडिटेशन को शामिल करने से मन की चंचलता कम होती है। पतंग हवा में कितनी भी ऊंची उड़े, लेकिन वह बंधी अपनी डोर से ही रहती है। इसी तरह, हमारा जीवन तभी तक सुरक्षित और सफल है जब तक उसकी डोर ‘मन के अनुशासन’ के हाथ में है। बिना अनुशासन के सफलता एक भ्रम है और बिना एकाग्रता के शांति एक कल्पना। इसलिए, जीवन को सार्थक और आनंदमय बनाने के लिए मन को साधना ही सबसे पहला और अनिवार्य कदम है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

