मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मनुष्य का जीवन विरोधाभासों से भरा है ।मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं—रोटी, कपड़ा और मकान—सीमित हैं। इन्हें आसानी से पूरा किया जा सकता है, परंतु, जब ये आवश्यकताएं ‘इच्छाओं’ में बदल जाती हैं, तो इनका कोई अंत नहीं होता। एक इच्छा पूरी होते ही दस नई इच्छाएं जन्म ले लेती हैं। इंसान अपनी पूरी जिंदगी खत्म ना होने वाली इन इच्छाओं की पूर्ति में लगा देता है, जिससे उसका मन कभी शांत नहीं हो पाता। आज का इंसान मखमली गद्दों और एसी कमरों में तो सो रहा है, लेकिन सुकून की नींद से कोसों दूर है। दिनभर की भागदौड़, तनाव, और भविष्य की चिंता ने उसकी रातों की नींद छीन ली है।
इसके विपरीत, एक मज़दूर बिना किसी आधुनिक साधन के भी फुटपाथ पर गहरी और चैन की नींद सो जाता है । सुविधाएं शरीर को आराम दे सकती हैं, मन को नहीं । जो व्यक्ति जितना संपन्न है, उसके पास उतनी ही अधिक जिम्मेदारियां, निर्णय लेने के द्वंद्व और सामाजिक अपेक्षाएं होती हैं। वास्तविक सुख भौतिक वस्तुओं के संचय में नहीं, बल्कि संतोष में है। जब तक इंसान अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना नहीं सीखेगा, तब तक सुविधाएं बढ़ने के साथ उसकी दुविधाएं भी बढ़ती रहेंगी। जीवन को सुखी बनाने का एकमात्र मार्ग है—साधनों का उपयोग करें, लेकिन उन्हें खुद पर हावी ना होने दें।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

