आज जब हम पत्रकारिता की बात करते हैं, तो अक्सर चकाचौंध वाले न्यूज़ रूम और बड़े-बड़े एंकर्स की तस्वीर सामने आती है, लेकिन इस तस्वीर के पीछे एक कड़वा सच यह है कि एस. सी/एस.टी पिछड़े वर्ग की महिला पत्रकारों के लिए यहाँ तक पहुँचने की राह आज भी कांटों भरी है।सावित्रीबाई फुले के सपनों के भारत में, जहाँ उन्होंने हर महिला के हाथ में कलम देखने की चाह रखी थी,वर्तमान में सामाजिक भागीदारी में न के बराबर महिलाएं हैं।
आज भी भारत के बड़े मीडिया घरानों में ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों की लिस्ट देखें, तो बहुजन महिलाओं का नाम ढूँढना मुश्किल होता है। इसे हम ‘कांच की छत’ (Glass Ceiling) ⁰कहते हैं—एक ऐसी अदृश्य दीवार जो काबिलियत होने के बावजूद उन्हें आगे बढ़ने से रोकती है। अक्सर उन्हें रिपोर्टिंग के लिए ऐसे विषय दिए जाते हैं जो केवल जाति या गरीबी से जुड़े हों, जबकि राजनीति या बिज़नेस जैसे क्षेत्रों में उन्हें अपनी योग्यता साबित करने के मौके कम मिलते हैं।जहां वह अच्छा कर सकती हैं ।कहते हैं जब मुख्य दरवाजे बंद हों, तो अपनी खिड़की खुद खोल लेनी चाहिए। शोषित महिलाओं ने ठीक यही किया।खुद की डिजिटल संस्था जैसे मंच बनाकर यह साबित कर दिया कि एक बहुजन महिला न केवल अच्छी पत्रकार हो सकती है, बल्कि वह अपना खुद का मीडिया संस्थान भी चला सकती है। आज यूट्यूब और सोशल मीडिया के जरिए ये महिलाएं सीधे उन बस्तियों और गांवों से रिपोर्टिंग कर रही हैं, जहाँ मुख्यधारा का कैमरा कभी नहीं पहुँचता।
- अनुसूचित जाति पिछड़े वर्ग की महिलाओं का दोहरी मार’ का संघर्ष*
एक बहुजन महिला पत्रकार को दो मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ता है:आज भी अगर आप भारत के बड़े और नामी न्यूज़ रूम्स में जाएं, तो वहां का माहौल काफी एकतरफा दिखेगा। आंकड़ों से परे हटकर अगर इंसानियत के नाते देखें, तो एक बहुजन महिला पत्रकार के लिए वहां तक पहुँचना किसी ‘एवरेस्ट’ फतह करने जैसा है। अक्सर उन्हें वहां वह जगह नहीं मिलती जिसकी वे हकदार होती हैं। उन्हें ‘आरक्षण’ के चश्मे से देखा जाता है, उनकी काबिलियत पर शक किया जाता है, और कई बार तो उन्हें उनकी जाति के कारण हाशिए पर धकेल दिया जाता है।एक हाशिए पर खड़ी महिला पत्रकार दोहरी लड़ाई लड़ती है। एक तरफ पितृसत्ता (पुरुष प्रधान सोच) है जो उन्हें एक ‘औरत’ होने के नाते कमजोर समझती है, और दूसरी तरफ जातिवाद है जो उन्हें उनकी पहचान के कारण कमतर आंकता है। न्यूज़ रूम के भीतर के ‘एलीट’ (विशिष्ट वर्ग)सर्कल में घुलना-मिलना उनके लिए मुश्किल हो जाता है क्योंकि उनका जीवन अनुभव और उनकी भाषा उन लोगों से अलग होती है जो विशेषाधिकारों के साथ पैदा हुए हैं।
1.पितृसत्ता: घर और बाहर यह साबित करना कि वह एक महिला होकर भी निडर पत्रकार बन सकती है।खुद को सुरक्षित रख सकती है,
2.जातिवाद: न्यूज़ रूम के भीतर उन सूक्ष्म पूर्वाग्रहों से लड़ना जहाँ उनकी प्रतिभा से ज्यादा उनकी पहचान को जाति से तौला जाता है।
3 ऑनलाइन ट्रोलिंग और मानसिक दबाव भी बनता है बांधा
आज जब कोई निम्न वर्ग महिला पत्रकार अपनी पहचान के साथ बेबाकी से बोलती है, तो उसे सोशल मीडिया पर भयंकर ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। यह उनके हौसले को तोड़ने की कोशिश होती है, लेकिन इसके बावजूद वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। संघर्ष कर रही है “चारदीवारी को लांघ कर कलम हाथ में पकड़कर
तोड़ रही वो स्त्रीत्वत की सीमा”
.”पत्रकारिता में ग्रामीण शोषित वंचित महिलाओं का होना बहुत जरूरी है वो लिखती हैं जमीं की हकीकत वो लिखती पैरों में बांधी गई जंजीर की कड़ियों को वो लिख देती है शमशान तक के झूठ को “
पत्रकारिता का असली मकसद समाज का आईना होना है। अगर आईना दिखाने वाली टीम में जनसाधारण की महिलाएं नहीं होंगी, तो आधी आबादी और समाज के एक बड़े हिस्से की सच्चाई कभी सामने नहीं आएगी। जब एक दबी हुई महिला रिपोर्टिंग करती है, तो वह सिर्फ खबर नहीं पढ़ती, वह उस दर्द और संघर्ष को भी समझती है जिसे बाकी लोग शायद देख भी न पाएं।
आज की अस्पृश्यता की शिकार महिला पत्रकार सावित्रीबाई फुले की आधुनिक विरासत हैं। वे अब सिर्फ खबरें सुन नहीं रही हैं, बल्कि खबरें लिख रही हैं और सत्ता से कड़े सवाल पूछ रही हैं। स्थिति बदल रही है, पर अभी लंबी दूरी तय करना बाकी है। हमें एक ऐसे मीडिया की जरूरत है जहाँ ‘योग्यता’ जाति की मोहताज न हो।
लेखक
अधिवक्ता अंशु सिंह जर्नलिस्ट
MAJMC,M.A Economics, LLB।
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